गुरुजी की सीख 1


राधे राधे ॥ आज का भगवद चिन्तन ॥
     
सब वस्तुओं की तुलना कर लेना मगर अपने भाग्य की कभी भी किसी से तुलना मत करना। अधिकांशतया लोगों द्वारा अपने भाग्य की तुलना दूसरों से कर व्यर्थ का तनाव मोल लिया जाता है व उस परमात्मा को ही सुझाव दिया जाता है कि उसे ऐसा नहीं, ऐसा करना चाहिए था।
 
परमात्मा से शिकायत मत किया करो। हम अभी इतने समझदार नहीं हुए कि उसके इरादे समझ सकें। अगर उस ईश्वर ने आपकी झोली खाली की है तो चिंता मत करना क्योंकि शायद वह पहले से कुछ बेहतर उसमे डालना चाहता हो।
 
अगर आपके पास समय हो तो उसे दूसरों के भाग्य को सराहने में न लगाकर स्वयं के भाग्य को सुधारने में लगाओ। परमात्मा भाग्य का चित्र अवश्य बनाता है मगर उसमें कर्म रुपी रंग तो खुद ही भरा जाता है।

!!!...ख़ुद मझधार में होकर भी
जो औरों का साहिल होता है
ईश्वर जिम्मेदारी उसी को देता हैं
जो निभाने के क़ाबिल होता है....!!!
         


परमात्मा हर पल हमारे हृदय में है हमारे सब से नजदीक है और हर पल हमारा भला चाहते है। उन की कृपा पर भरोसा कर कर सर्वतोभाव से उन्ही पर छोड़ देना चाहिए।

संसार स्वप्नवत है मृगतृष्णा के जल के समान समझना ही वैराग्य है । वैराग्य के बिना संसार से मन नही हटता इस लिए परमात्मा की तरफ जाना कठिन होता है। अतएव संसार की स्थिति पर विचार कर के अपने असली स्वरुप को समझना और वैराग्य को बढ़ाना चाहिए।

भगवन एकमात्र मोक्ष के दाता है उन का चिंतन करने से सभी बन्धन कट जाते है तुम कितने भी पापी दुराचारी हो भगवन फिर भी तुम्हे अपने साथ मिलाना चाहते अतः एक बार सच्ची निर्भयता के साथ निश्चय कर के उनकी शरण ग्रहण करो तुम्हारे सब बंधन क्षणों में कट जायेगे और तुम उनके दुर्लभ मोक्ष स्वरूप को पा लोगे।

जीवन की कोई ऐसी परिस्थिति नहीं जिसे अवसर में ना बदला जा सके। हर परिस्थिति का कुछ ना सन्देश होता है। अगर हमारे  पास किसी दिन कुछ खाने को ना हो तो भी श्री सुदामा जी की तरह प्रभु को धन्यवाद दें कि  " हे प्रभु ! आज आपकी कृपा से यह एकादशी जैसा पुण्य मुझे प्राप्त हो रहा है।"

अगर कभी भारी संकट भी आ जाए तो माँ कुंती की तरह भगवान के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करें कि "हे प्रभु ! यदि  मेरे जीवन में यह दुःख ना आता तो मै आपको कैसे स्मरण करता ?"

जीवन की कोई ऐसी परिस्थिति नहीं जिसे अवसर में ना बदला जा सके। हर परिस्थिति का कुछ ना सन्देश होता है। अगर हमारे  पास किसी दिन कुछ खाने को ना हो तो भी श्री सुदामा जी की तरह प्रभु को धन्यवाद दें कि  " हे प्रभु ! आज आपकी कृपा से यह एकादशी जैसा पुण्य मुझे प्राप्त हो रहा है।"

अगर कभी भारी संकट भी आ जाए तो माँ कुंती की तरह भगवान के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करें कि "हे प्रभु ! यदि  मेरे जीवन में यह दुःख ना आता तो मै आपको कैसे स्मरण करता ?"


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