Welfare and complaint

🌹🌹🌹*भलाई और शिकायत*🌹🌹🌹

*एक बार एक केकड़ा समुद्र किनारे अपनी मस्ती में चला जा रहा था और बीच बीच में रुक कर अपने पैरों के निशान देख कर खुश होता*
*आगे बढ़ता पैरों के निशान देखता और खुश होता,,,,,*
*इतने में एक लहर आई और उसके पैरों के सभी निशान मिट गये*
*इस पर केकड़े को बड़ा गुस्सा आया, उसने लहर से कहा*

*"ए लहर मैं तो तुझे अपना मित्र मानता था, पर ये तूने क्या किया ,मेरे बनाये सुंदर पैरों के निशानों को ही मिटा दिया*
*कैसी दोस्त हो तुम"*

*तब लहर बोली "वो देखो पीछे से मछुआरे पैरों के निशान देख कर केकड़ों को पकड़ने आ रहे हैं*
*हे मित्र, तुमको वो पकड़ न लें ,बस इसीलिए मैंने निशान मिटा दिए*

*ये सुनकर केकड़े की आँखों में आँसू आ गये ।*

*हमारे साथ भी तो ऐसा ही होता है ज़िन्दगी अच्छी खासी चलती रहती है, और हम उसे देखते रहने में ही इतने ज्यादा मगन हो जाते हैं कि सोचते हैं कि बस इसी तरह ही ज़िन्दगी चलती रहे ।*

*लेकिन जैसे ही कोई दुःख या मुसीबत आती है या कोई काम हमारी सोच के मुताबित नही होता तो हम ऊँगली उस मलिक की तरफ उठाना शुरू कर देते हैं, लेकिन ये भूल जाते हैं कि शायद ये दुःख या तकलीफ जो उसने दी हुई है, इसके पीछे भी हमारे भले का कोई राज छिपा होगा ।*

*जब तक समय और काम हमारी मर्ज़ी से चलते रहते है , तब हम खुश रहते है, और जब काम उस मालिक की मर्ज़ी से होता है, तो हम क्यों उसकी तरफ मुँह बना कर शिकायत करने पर आ जाते हैं। जबकि हमे तो खुश होना चाहिए कि जब मैं अपनी मर्ज़ी से इतना खुश था तो अब मुझे मलिक की मर्ज़ी कितना खुश रख सकती है ।

*उसकी☝ मौज दिखती नही, लेकिन दिखाती बहुत है ।*

*उसकी☝ मौज बोलती नही, लेकिन करती बहुत है|*

🙏🙏🌹तेरा भाणा मीठा लागे🌹🙏🙏

🙏🌷*जय जय गुरुजी*🌷🙏

🙏🌷*ऊँ नमः शिवायः शिवजी सदा सहाय*🌷🙏

🙏🌷*ऊँ नमः शिवायः गुरुजी सदा सहाय*🌷🙏

🙏🌷*जय जय गुरुजी*🌷🙏 
                                              
🙏🌷*शुक्रराना गुरुजी*🌷🙏

Real pleasure of life

Real pleasure is full of contentment and satisfaction. We see the child is playing with great enthusiasm and energy. He is fully absorbed in his play and does not see anything around him. He is so observed in his play that he does not pay attention to his mother's call. The reason is that he is getting much pleasure in his game and fully devoted to his game. But when we become mature we forget this quality and always worried about our carrier and future. What is the reason of this Indifference of life in old age ? The person who wants to get real pleasure must leave everything except his work. He should enjoy his work with great pleasure and satisfaction he must believe in God and have faith in God for leaving a very soothing and easy life. We should never forget our childhood memories which keeps us healthy ,energetic and enthusiastic towards life perspective.

Memories of childhood

किराये की साइकिल . .
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पहले हम लोग गर्मियों में किराए की छोटी साईकिल लेते थे, अधिकांस लाल रंग की होती थी जिसमें पीछे कैरियर नहीं होता। जिससे आप किसी को डबल न बैठाकर घूमे। एक साईकिल वाले ने तो पिछले मडगार्ड पर धारदार नुकीले कीले तक लगवा दिए थे  किराया शायद 50 पैसे प्रति घंटा होता था किराया पहले लगता था ओर दुकानदार नाम पता नोट कर लेता था उस समय पैसे की बहुत ही ज्यादा कीमत हुआ करती थी जो आज नहीं रही आज के इस युग में बच्चों को मिलने वाला जेब खर्च भी हजारों में हुआ करता है जो हमारे समय में 50 पैसे हुआ करता था

किराये के नियम कड़े होते थे .. जैसे की हवाई जहाज लेना हो। पंचर होने पर सुधारने के पैसे, टूट फूट होने पर आप की जिम्मेदारी, खैर ! हम खटारा छोटी सी किराए की  साईकिल पर सवार उन गलियों के युवराज होते  थे, पूरी ताकत से पैड़ल मारते, कभी हाथ छोड़कर चलाते ओर  बैलेंस करते, तो कभी गिरकर उठते और फिर चल देतेा सृष्टि के इसी नियम से आज भी दुनिया चलती है।

अपनी गली में आकर सारे दोस्त, बारी बारी से, साईकिल चलाने मांगते किराये की टाइम की लिमिट न निकल जाए, इसलिए तीन-चार बार साइकिल लेकर दूकान के सामने से निकलते। आज समय की वह कीमत नहीं रह गई है जो पहले हुआ करती थी

तब किराए पर साइकिल लेना ही अपनी रईसी होती। खुद की अपनी छोटी साइकिल रखने वाले तब रईसी झाड़ते। वैसे हमारे घरों में बड़ी काली साइकिलें ही होती थी। जिसे स्टैंड से उतारने और लगाने में पसीने छूट जाते। जिसे हाथ में लेकर दौड़ते, तो एक पैड़ल पर पैर जमाकर बैलेंस करते। किसी की मदद ना मिलने पर अपने हाथ पैर तुड़वा कर घर आ जाया करते थे।

ऐसा  करके फिर कैंची चलाना सीखें। बाद में डंडे को पार करने का कीर्तिमान बनाया, इसके बाद सीट तक पहुंचने का सफर एक नई ऊंचाई था। फिर सिंगल, डबल, हाथ छोड़कर, कैरियर पर बैठकर साइकिल के खेल किए। ख़ैर जिंदगी की साइकिल अभी भी चल रही है। बस वो दौर वो आनंद नही है।

क्योंकि कोई माने न माने पर जवानी से कहीं अच्छा वो खूबसूरत बचपन ही हुआ करता था साहब.. जिसमें दुश्मनी की जगह सिर्फ एक कट्टी हुआ करती थी और सिर्फ दो उंगलिया जुडने से दोस्ती फिर शुरू हो जाया करती थी। अंततः बचपन एक बार निकल जाने पर सिर्फ यादें ही शेष रह जाती है और रह रह कर याद आकर सताती है। उन यादों के सहारे आज हम कल्पना ही कर सकते हैं कि हमारा समय कितना अच्छा और आनंद से भरपूर था
आजकल पेड़ पर लटके हुए आम भी अपनेआप ही गिरने लगे है। हमारे जमाने में आम तोड़ने के लिए घरों से निकल जाया करते थे और पेड़ों पर चढ़ कर चोरी छुपे आम तोड़ा करते थे जो आज कतई संभव है ही नहीं
सुना है आज के बच्चो का बचपन एक मोबाईल चुराकर ले गया है। क्योंकि मां बाप अपना समय बचाने के लिए बच्चों को मोबाइल दे देते हैं ना उनके पास अपने बच्चों के लिए समय है और ना ही उनकी किसी तरह की सुख सुविधा का ख्याल है
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Real education and religion

🌷शिक्षा या विद्या🌻

सन्तोष मिश्रा जी के यहाँ पहला लड़का हुआ तो पत्नी ने कहा बच्चे को गुरुकुल में शिक्षा दिलवाते है, मैं सोच रही हूँ कि गुरुकुल में शिक्षा देकर उसे धर्म ज्ञाता पंडित योगी बनाऊंगी।
सन्तोष जी ने पत्नी से कहा पाण्डित्य पूर्ण योगी बना कर इसे भूखा मारना है क्या ।
मैं इसे बड़ा अफसर बनाऊंगा ताकि दुनिया में एक कामयाबी वाला इंसान बने, संतोष जी सरकारी बैंक में मैनेजर के पद पर थे ! पत्नी धार्मिक थी और इच्छा थी कि बेटा पाण्डित्य पूर्ण योगी बने, लेकिन सन्तोष जी नहीं माने।
दूसरा लड़का हुआ पत्नी ने जिद की, सन्तोष जी इस बार भी ना माने, तीसरा लड़का हुआ पत्नी ने फिर जिद की, लेकिन सन्तोष जी एक ही रट लगाते रहे कहा से खाएगा कैसे जिंदगी गुजारेगा और नही माने।
चौथा लड़का हुआ इस बार पत्नी की जिद के आगे सन्तोष जी हार गए अंततः उन्होंने गुरुकुल में शिक्षा दीक्षा दिलवाने के लिए वही भेज दिया ।

अब धीरे धीरे समय का चक्र घूमा, अब वो दिन आ गया जब बच्चे अपने पैरों पे मजबूती से खड़े हो गए, पहले के तीनों लड़के मेहनत करके सरकारी नौकरियां हासिल कर ली, पहला डॉक्टर, दूसरा बैंक मैनेजर, तीसरा एक गोवरमेंट कंपनी जॉब करने लगा।

एक दिन की बात है सन्तोष जी ने पत्नी से बोले---अरे भाग्यवान देखा मेरे तीनो होनहार बेटे सरकारी पदों पे हो गए न, अच्छा कमाई भी कर रहे है, तीनो की जिंदगी तो अब सेट हो गयी, कोई चिंता नही रहेगी अब तीनो को।लेकिन अफसोस मेरा सबसे छोटा बेटा पाण्डित्य ज्ञान लेकर इधर उधर, "कथा, भागवत, शादी-विवाह" करवा कर जीवन यापन करने को मजबूर रहेगा। जितना 6 महीने में कमाएगा उतना मेरा एक बेटा एक महीने में कमा लेगा, अरे भाग्यवान तुमने अपनी मर्जी करवा कर बड़ी गलती की तुम्हे भी आज इस पर पश्चाताप होता होगा मुझे मालूम है लेकिन तुम बोलती नही हो-- पत्नी ने कहा हम मे से कोई एक गलत है, और ये आज दूध का दूध पानी का पानी हो जाना चाहिए, चलो अब हम परीक्षा ले लेते है चारो की, कौन गलत है कौन सही पता चल जाएगा।
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दूसरे दिन शाम के वक्त पत्नी ने बाल बिखरा कर अपनी साड़ी के पल्लू फाड़ कर और चेहरे पर एक दो नाखून के निशान मार कर आंगन मे बैठ गई और पतिदेव को अंदर कमरे मे छिपा दिया ..!!
बड़ा बेटा आया पूछा मम्मी क्या हुआ ?
जवाब दिया तुम्हारे पापा ने मारा है !
पहला बेटा :- बुड्ढा सठिया गया है क्या कहा है बुलाओ
मम्मी :-नही है बाहर गए है !
पहला बेटा :- आए तो मुझे बुला लेना कमरे मैं कमरे मे हूँ, मेरा खाना निकाल दो मुझे भूख लगी है ! ये कहकर कमरे मे चला गया ।
दूसरा बेटा आया पूछा तो मम्मी ने वही जवाब दिया
दूसरा बेटा :- क्या पगला गए है इस बुढ़ापे मे उनसे कहना चुपचाप अपनी बची कुची जिंदगी गुजार ले, आए तो मुझे बुला लेना और मैं खाना खाकर आया हूँ सोना है मुझे अगर आये तो मुझे अभी मत जगाना सुबह खबर लेता हूँ, उनकी ये कहकर वो भी अपने कमरे मे चला गया ।
तीसरा बेटा आया पूछा तो आगबबूला हो गया इस बुढ़ापे मे अपनी औलादो के हाथ से जूते खाने वाले काम कर रहे है ! इसने तो मर्यादा की सारी हदें पार करके अपने कमरे मे चला गया ।।
संतोष जी अंदर बैठे बैठे सारी बाते सुन रहे थे ऐसा लग रहा था कि जैसे उनके पैरों के नीचे से जमीन खिसक गई हो, और उसके आंसू नही रुक रहे थे, किस तरह इन बच्चो के लिए दिन रात मेहनत करके पाला पोसा उनको बड़ा आदमी बनाया, जिसकी तमाम गलतियों को मैंने नजरअंदाज करके आगे बढ़ाया ! और ये ऐसा बर्ताव अब तो बर्दाश्त ही नही हो रहा, आंसू पोछते हुए उठे कमरे से बाहर निकलने के लिए इतने मे चौथा बेटा घर मे "जय भोले भंडारी" करते हुए अंदर आया।।
माँ को इस हाल मे देखा तो भागते हुए आया पूछा, तो माँ ने अब गंदे गंदे शब्दो मे अपने पति को बुरा भला कहा।
तो चौथे बेटे ने माँ का हाथ पकड़ कर समझाया कि माँ आप पिताश्री की प्राण हो, वो आपके बिना अधूरे हैं,---अगर पिता जी ने आपको कुछ कह दिया तो क्या हुआ मैंने पिता जी को आज तक आपसे बत्तमीजी से बात करते हुए नही देखा, वो आपसे हमेशा प्रेम से बाते करते थे, जिन्होंने इतनी सारी खुशिया दी आज नाराजगी से पेश आए तो क्या हुआ, हो सकता है आज उनको किसी बात को लेकर चिंता रही हो, हो ना हो माँ आप से कही गलती जरूर हुई होगी, अरे माँ पिता जी आपका कितना ख्याल रखते है याद है न आपको, 6 साल पहले जब आपकी स्वास्थ्य ठीक नही था,  तो पिता जी ने कितने दिनों तक आपकी सेवा किये थे, वही भोजन बनाते थे, घर का सारा काम करते थे, कपड़े धुलते थे, तब फोन करके मुझे सूचना दी थी, कि मैं संसार की सबसे भाग्यशाली औरत हूँ, तुम्हारे पिताजी मेरा बहुत ख्याल करते हैं ।
इतना सुनते ही बेटे को गले लगाकर फफक फफक कर रोने लगी, सन्तोष जी आँखो मे आंसू लिए सामने खड़े थे। 
अब बताइये क्या कहेंगे आप मेरे फैसले पर, पत्नी ने संतोष जी से पूछा।
सन्तोष जी तुरन्त अपने बेटे को गले लगा लिया, !
सन्तोष जी की धर्मपत्नी ने कहा ये शिक्षा इंग्लिश मीडियम स्कूलो मे नही दी जाती ।
माँ-बाप से कैसे पेश आना है ये तो "गीता और रामायण" ही बताता है माँ-बाप की सेवा करना सिर्फ "गीता और रामायण" सिखाता है
अब सन्तोष जी को एहसास हुआ जिन बच्चो पर लाखो खर्च करके डिग्रीया दिलाई वो सब जाली निकली असल में ज्ञानी तो वो सब बच्चे है, जिन्होंने जमीन पर बैठ कर
जेहि सुमिरत सिधि होइ गन नायक करिबर बदन।
करउ अनुग्रह सोइ बुद्धि रासि सुभ गुन सदन।।☺
पढ़ा है, मैं कितना बड़ा नासमझ था, फिर दिल एक आवाज निकलती है, काश मैंने चारो बेटो को गुरुकुल में शिक्षा दीक्षा दी होती ।

ये पोस्ट काल्पनिक नहीं, ऐसे हालात मैंने अपने मोहल्ले, आस पास, बाजारों में देखा है, उसी को विस्तार से लिखा हूँ,

लेकिन यह हमारे जीवन की कड़वी सच्चाई है कि आजकल के बच्चे शिक्षित होकर भी अपने मां-बाप का आदर सम्मान नहीं करते और उनको दूसरे दर्जे की हैसियत दे कर रखते हैं

Real Pleasure of Darshan

बनतो को बिगड़ते देखा है, बिगड़ो को भी बनते देखा है ।
जो खूब अकड़ के चलते थे उन्हें मिट्टी में मिलते देखा है ।।
तमन्ना अगर है तुझे आनन्द की, तो फिर फिकरत कर फकीरों  की ।
नहीं वो लाल मिलता है अमीरों के खजाने में ।।

महाराज श्री ने कहा कि जिस सुख की तलाश में यह दुनिया है मेरे प्यारे वह सुख बड़े महलों में नहीं मिलता बल्कि किसी की सेवा में मिलता है, फकीरों की सेवा में मिलता है। सुख वो नहीं है जो आलिशान महलों में मिलता है बल्कि सुख वो है जो यहां जमीन में बैठे हुए आनन्द ले रहे हो।
महाराज जी ने कहा है कि अगर इस भवसागर से पार होना चाहते हो तो अपने जीवन में भगवत नाम की शरण ग्रहण कर लेनी चाहिए।

महाराज श्री ने कथा के प्रसंग का वृतांत सुनाते हुए बताया कि महाबली ने भगवान ब्रह्मा को प्रसन्न करने के लिए तपस्या की थी जिसके फलस्वरूप भगवान ब्रह्मा ने प्रकट होकर वरदान मांगने को कहा। बाली भगवान ब्रह्मा के आगे नतमस्तक होकर बोला “प्रभु, मै इस संसार को दिखाना चाहता हँप कि असुर अच्छे भी होते हैं। मुझे इंद्र के बराबर शक्ति चाहिए और मुझे युद्ध में कोई पराजित ना कर सके।" भगवान ब्रह्मा ने इन शक्तियों के लिए उसे उपयुक्त मानकर बिना प्रश्न किये उसे वरदान दे दिया।
शुक्राचार्य एक अच्छे गुरु और रणनीतिकार थे जिनकी मदद से बाली ने तीनो लोकों पर विजय प्राप्त कर ली। बाली ने इंद्रदेव को पराजित कर इंद्रलोक पर कब्जा कर लिया। एक दिन गुरु शुक्राचार्य ने बाली से कहा अगर तुम सदैव के लिए तीनो लोकों के स्वामी रहना चाहते हो तो तुम्हारे जैसे राजा को अश्वमेध यज्ञ अवश्य करना चाहिए।
बाली अपने गुरु की आज्ञा मानते हुए यज्ञ की तैयारी में लग गया। बाली एक उदार राजा था जिसे सारी प्रजा पसंद करती थी। इंद्र को ऐसा महसूस होने लगा कि बाली अगर ऐसे ही प्रजापालक रहेगा तो शीघ्र सारे देवता भी बाली की तरफ हो जायेंगे।
इंद्रदेव देवमाता अदिति के पास सहायता के लिए गए और उन्हें सारी बात बताई। देवमाता ने बिष्णु भगवान से वरदान माँगा कि वे उनके पुत्र के रूप में धरती पर जन्म लेकर बाली का विनाश करें। जल्द ही अदिति और ऋषि कश्यप के यहाँ एक सुंदर बौने पुत्र ने जन्म लिया। पांच वर्ष का होते ही वामन का जनेऊ समारोह आयोजित कर उसे गुरुकुल भेज दिया।
इस दौरान महाबली ने 100 में से 99 अश्वमेध यज्ञ पुरे कर लिए थे। अंतिम अश्वमेध यज्ञ समाप्त होने ही वाला था कि तभी दरबार में दिव्य बालक वामन पहुँच गया।
महाबली ने कहा कि आज वो किसी भी व्यक्ति को कोई भी दक्षिणा दे सकता है। तभी गुरु शुक्राचार्य महाबली को महल के भीतर ले गये और उसे बताया कि ये बालक ओर कोई नहीं स्वयं भगवान विष्णु हैं वो इंद्रदेव के कहने पर यहाँ आए हैं और अगर तुमने इन्हें जो भी मांगने को कहा तो तुम सब कुछ खो दोगे।

महाबली अपनी बात पर अटल रहे और कहा मुझे वैभव खोने का भय नहीं है बल्कि अपन प्रभु को खोने का है इसलिए मै उनकी इच्छा पूरी करूंगा।
महाबली उस बालक के पास गया और स्नेह से कहा “आप अपनी इच्छा बताइये”।
उस बालक ने महाबली की और शांत स्वभाव से देखा और कहा “मुझे केवल तीन पग जमीन चाहिए जिसे मैं अपने पैरों से नाप सकूं”।
महाबली ने हँसते हुए कहा “केवल तीन पग जमीन चाहिए, मैं तुमको दूँगा।"
जैसे ही महाबली ने अपने मुँह से ये शब्द निकाले वामन का आकार धीरे धीरे बढ़ता गया। वो बालक इतना बढ़ा हो गया कि बाली केवल उसके पैरों को देख सकता था। वामन आकार में इतना बढ़ा था कि धरती को उसने अपने एक पग में माप लिया।
दुसरे पग में उस दिव्य बालक ने पूरा आकाश नाप लिया। अब उस बालक ने महाबली को बुलाया और कहा मैंने अपने दो पगों में धरती और आकाश को नाप लिया है। अब मुझे अपना तीसरा कदम रखने के लिए कोई जगह नहीं बची, तुम बताओ मैं अपना तीसरा कदम कहाँ रखूँ।
महाबली ने उस बालक से कहा “प्रभु, मैं वचन तोड़ने वालों में से नहीं हूँ आप तीसरा कदम मेरे शीश पर रखिये।"
भगवान विष्णु ने भी मुस्कुराते हुए अपना तीसरा कदम महाबली के सिर पर रख दिया। वामन के तीसरे कदम की शक्ति से महाबली पाताल लोक में चला गया। अब महाबली का तीनो लोकों से वैभव समाप्त हो गया और सदैव पाताल लोक में रह गया। इंद्रदेव और अन्य देवताओं ने भगवान विष्णु के इस अवतार की प्रशंशा की और अपना साम्राज्य दिलाने के लिए धन्यवाद दिया।
इसके बाद पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में सभी भक्तों ने श्री कृष्ण जन्मोत्सव को बड़ी धूमधाम से मनाया।
।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।