GOD IS BEFORE YOU IF HAVE FIRM FAITH

*ऊँ ! माँ चिंतापूरणी जी के पावन चरणों में राज कुमार गुप्ता का  शत शत नमन
विश्वास हो तो ईश्वर आपके समक्ष है !

एक बेटी ने एक संत से आग्रह किया कि वो घर आकर उसके बीमार पिता से मिलें, प्रार्थना करें ।
बेटी ने ये भी बताया कि उसके बुजुर्ग पिता पलंग से उठ भी नहीं सकते !
जब संत घर आए तो पिता पलंग पर दो तकियों पर सिर रखकर लेटे हुए थे।
एक खाली कुर्सी पलंग के साथ पड़ी थी।
संत ने सोचा कि शायद मेरे आने की वजह से ये कुर्सी यहां पहले से ही रख दी गई है।
संत, "मुझे ये खाली कुर्सी देखकर लगा कि आप को मेरे आने का आभास था।*
"पिता... ओह ये बात...। खाली कुर्सी। आप...!
आपको अगर बुरा न लगे तो कृपया कमरे का दरवाज़ा बंद करेंगे...!
संत को ये सुनकर थोड़ी हैरत हुई, फिर भी दरवाज़ा बंद कर दिया...।
पिता.. "दरअसल इस खाली कुर्सी का राज़ मैंने किसी को नहीं बताया। अपनी बेटी को भी नहीं। पूरी ज़िंदगी, मैं ये जान नहीं सका कि प्रार्थना कैसे की जाती है। मंदिर जाता था, पुजारी जी के श्लोक सुनता। वो सिर के ऊपर से गुज़र जाते। कुछ पल्ले नहीं पड़ता था। मैंने फिर प्रार्थना की कोशिश करना छोड़ दिया...!
लेकिन चार साल पहले मेरा एक दोस्त मिला।
उसने मुझे बताया कि प्रार्थना कुछ नहीं,भगवान से सीधे संवाद का माध्यम होती है।
उसी ने सलाह दी कि एक खाली कुर्सी अपने सामने रखो।
फिर विश्वास करो कि वहां भगवान खुद ही विराजमान हैं।
अब भगवान से ठीक वैसे ही बात करना शुरू करो, जैसे कि अभी तुम मुझसे कर रहे हो।
मैंने ऐसा करके देखा। मुझे बहुत अच्छा लगा।
फिर तो मैं रोज़ दो-दो घंटे ऐसा करके देखने लगा। लेकिन ये ध्यान रखता कि मेरी बेटी कभी मुझे ऐसा करते न देख ले।
अगर वो देख लेती तो वो फिर मुझे साइकाइट्रिस्ट के पास ले जाती...!"
ये सब सुनकर संत ने बुजुर्ग के लिए प्रार्थना की। सिर पर हाथ रखा और भगवान से बात करने के क्रम को जारी रखने के लिए कहा।
संत को उसी दिन दो दिन के लिए शहर से बाहर जाना था इसलिए विदा लेकर चले गए |
दो दिन बाद बेटी का संत को फोन आया कि उसके पिता की उसी दिन कुछ घंटे बाद मृत्यु हो गई थी, जिस दिन वो आप से मिले थे |
*संत ने पूछा कि उन्हें प्राण छोड़ते वक्त कोई तकलीफ़ तो नहीं हुई ?
बेटी ने जवाब दिया... नहीं!
मैं जब घर से काम पर जा रही थी तो उन्होंने मुझे बुलाया...मेरा माथा प्यार से चूमा |
ये सब करते हुए उनके चेहरे पर ऐसी शांति थी, जो मैंने पहले कभी नहीं देखी थी।
मैं वापस आई तो वो हमेशा के लिए आंखें मूंद चुके थे |
लेकिन मैंने एक अजीब सी चीज़ भी देखी...वो ऐसी मुद्रा में थे जैसे कि खाली कुर्सी पर किसी की गोद में अपना सिर झुकाया हो।
संत जी, वो क्या था...।
ये सुनकर संत की आंखों से आंसू बह निकले... बड़ी मुश्किल से बोल पाए...काश, मैं भी जब दुनिया से जाऊं तो ऐसे ही जाऊं।*

ईश्वर  कहीं  दूर  नहीं  हैं,
हमारे  विश्वास  में  कमी  और हमारा  अहंकार  हमें  उनकी  अनूभूति  नहीं  होने  देता |
जिस  पल  हमारा  विश्वास  दृढ  होता  है,
हम  उसे  अपने  निकट  ही  पाते  हैं !

माँ चिंतापूरनी की काल आरती श्रृंगार
आपका अपना
राज कुमार गुप्ता
माँ चिंत्पुरनी धाम ।
जय माता दी। जय शंकर जी

HOLY EASTER

On the occasion of holy Easter, what must we resolve to learn from the life of Jesus?  Bhagawan/God lovingly shares with us a few precious pearls today.

Jesus Christ exemplified several noble qualities. He gave protection to several poor and destitute people with a loving heart. Jesus earned such a good name by sacrificing His body on the cross. You also must be prepared for such a great sacrifice. You must purify your heart with selfless love and affection. We must Lead a life full of love and sacrifice! We must Never indulge in reviling others, for the same atma is permeating in every living being. If you abuse others, it amounts to abusing your own self. If you do not like them, keep yourself away from them, but never abuse them! Any amount of good work done by you will be of no use, if you do not give up bad qualities. You may not always oblige others’ requests, but you can always speak obligingly and lovingly. Nobody can escape from pain and suffering in this world. Today it is that person, tomorrow it could be you. Therefore if you find someone suffering, try to help for sake of God

Jesus Christ lived for humanity and sacrificed life for welfare of human beings.
Those who forget good deeds of others are enemy of humanity

Silence is gold

एक मछलीमार काँटा डालकर तालाब के किनारे बैठा था !  काफी समय बाद भी कोई मछली काँटे में नहीं फँसी, ना ही कोई हलचल हुई , तो वह सोचने लगा... कहीं ऐसा तो नहीं कि मैंने काँटा गलत जगह डाला है, यहाँ कोई मछली ही न हो ! उसने तालाब में झाँका तो देखा कि उसके काँटे के आसपास तो बहुत-सी मछलियाँ थीं ! उसे बहुत आश्चर्य हुआ कि इतनी मछलियाँ होने के बाद भी कोई मछली फँसी क्यों नहीं ?

एक राहगीर ने जब यह नजारा देखा , तो  उससे कहा ~ लगता है भैया ! यहाँ पर मछली मारने बहुत दिनों बाद आए हो ! अब इस तालाब की मछलियाँ काँटे में नहीं फँसतीं मछलीमार ने हैरत से पूछा ~

क्यों ... ऐसा क्या है यहाँ ?

राहगीर बोला ~ पिछले दिनों तालाब के किनारे एक बहुत बड़े संत ठहरे थे ! उन्होने यहाँ मौन की महत्ता पर प्रवचन दिया था !  उनकी वाणी में इतना तेज था कि जब वे प्रवचन देते तो सारी मछलियाँ भी बड़े ध्यान से सुनती !

यह उनके प्रवचनों का ही असर है , कि उसके बाद जब भी कोई इन्हें फँसाने के लिए काँटा डालकर बैठता है , तो ये मौन धारण कर लेती हैं !

जब मछली मुँह खोलेगी ही नहीं , तो काँटे में फँसेगी कैसे ? इसलिए ... बेहतर यहीं होगा कि, आप कहीं और जाकर काँटा डालो ।

परमात्मा ने हर इंसान को दो आँख, दो कान, दो नासिका, हर इन्द्रिय दो-दो ही प्रदान करी हैं , लेकिन जिह्वा एक ही दी है !

क्या कारण रहा होगा ?

क्योंकि ...  यह एक ही अनेकों भयंकर परिस्थितियाँ पैदा करने के लिये पर्याप्त है !

संत ने कितनी सही बात कही है , कि,
     
जब मुँह खोलोगे ही नहीं , तो ...फँसोगे कैसे ?

ऐसे ही, जो,
अगर इन्द्रिय पर संयम करना चाहते हैं , तो,इस जिह्वा पर नियंत्रण कर लो ..., तो, बाकी सब इन्द्रियाँ स्वयं नियंत्रित रहेंगी !

यह बात हमें भी अपने जीवन में उतार लेनी चाहिए !

जय गुरु जी

Serve humanity

एक समय मोची का काम करने वाले व्यक्ति को रात में भगवान ने सपना दिया और कहा - कल सुबह मैं तुझसे मिलने तेरी दुकान पर आऊंगा !

मोची की दुकान काफी छोटी थी और उसकी आमदनी भी काफी सीमित थी। खाना खाने के बर्तन भी थोड़े से थे। इसके बावजूद वो अपनी जिंदगी से खुश रहता था !

एक सच्चा, ईमानदार और परोपकार करने वाला इंसान था। इसलिए ईश्वर ने उसकी परीक्षा लेने का निर्णय लिया !

मोची मे सुबह उठते ही तैयारी शुरू कर दी। भगवान को चाय पिलाने के लिए दूध, चायपत्ती और नाश्ते के लिए मिठाई ले आया। दुकान को साफ कर वह भगवान का इंतजार करने लगा !

उस दिन सुबह से भारी बारिश हो रही थी। थोड़ी देर में उसने देखा कि एक सफाई करने वाली बारिश के पानी में भीगकर ठिठुर रही है !

मोची को उसके ऊपर बड़ी दया आई और भगवान के लिए लाए गये दूध से उसको चाय बनाकर पिलाई। दिन गुजरने लगा !

दोपहर बारह बजे एक महिला बच्चे को लेकर आई और कहा -  मेरा बच्चा भूखा है इसलिए पीने के लिए दूध चाहिए !

मोची ने सारा दूध उस बच्चे को पीने के लिए दे दिया। इस तरह से शाम के चार बज गए। मोची दिनभर बड़ी बेसब्री से भगवान का इंतजार करता रहा !

तभी एक बूढ़ा आदमी जो चलने से लाचार था आया और कहा -  मै भूखा हूं और अगर कुछ खाने को मिल जाए तो बड़ी मेहरबानी होगी !

मोची ने उसकी बेबसी को समझते हुए मिठाई उसको दे दी। इस तरह से दिन बीत गया और रात हो गई।!

रात होते ही मोची के सब्र का बांध टूट गया और वह भगवान को उलाहना देते हुए बोला  - वाह रे भगवान ! सुबह से रात कर दी मैंने तेरे इंतजार में लेकिन तू वादा करने के बाद भी नहीं आया। क्या मैं गरीब ही तुझे बेवकूफ बनाने के लिए मिला था !

तभी आकाशवाणी हुई और भगवान ने कहा - मैं आज तेरे पास एक बार नहीं, तीन बार आया और तीनों बार तेरी सेवाओं से बहुत खुश हुआ !

और तू मेरी परीक्षा में भी पास हुआ है, क्योंकि तेरे मन में परोपकार और त्याग का भाव सामान्य मानव की सीमाओं से परे हैं।!

किसी भी मजबूर या ऐसा व्यक्ति जिसको आपकी मदद की जरूरत है उसकी मदद जरूर करना चाहिए !

क्योंकि शास्त्रों में कहा गया है कि 'नर सेवा ही नारायण सेवा है' !

मदद की उम्मीद रखने वाले, जरूरतमंद और लाचार लोग धरती पर भगवान की तरह होते हैं  जिनकी सेवा से सुकून के साथ एक अलग संतुष्टी का एहसास होता है !!

                    

GURU KI SAKHIYA

गुरु गोबिंद सिंह जी ने खालसा पंथ को लोहे का कड़ा पहनने का हुक्म क्यों किया
एक दिन गुरु गोबिंद सिंह जी गंगा में नाव की सैर कर रहे थे| सैर करते हुए आपके हाथ से सोने का कड़ा दरिया में गिर गया| आप जब घर पहुँचे तो माता जी ने आपसे पूछा बेटा! आपका कड़ा कहाँ है? तब आपने माता जी को उत्तर दिया, माता जी! वह दरिया में गिरकर खो गया है|
माता जी फिर से पूछने लगी कि बताओ कहाँ गिरा है? गुरु जी माता जी को लेकर गंगा नदी के किनारे आ गए| उन्होंने अपने दूसरे हाथ का कड़ा भी उतारकर पानी में फैंक कर कहा कि यहाँ गिरा था| आप की यह लापरवाही देख कर माता जी को गुस्सा आया| वह उन्हें घर ले आई|
घर आकर गुरु जी ने माता जी को बताया कि माता जी! इन हाथों से ही अत्याचारियों का नाश करके गरीबों की रक्षा करनी है| इनके साथ ही अमृत तैयार करके साहसहीनों में शक्ति भरकर खालसा साजना है| यदि इन हाथों को माया के कड़ो ने जकड़ लिया, तो फिर यह काम जो अकाल पुरख ने करने की हमें आज्ञा की है वह किस तरह पूरे होंगे? जुल्म को दूर करने के लिए इन हाथों को लोहे जैसे शक्तिशाली मजबूत करने के लिए लोहे का कड़ा पहनना उचित है| अतः खालसा पंथ सजाकर आपने सिखों को लोहे का कड़ा ही पहनने का हुक्म किया, जो जगत प्रसिद्ध है|
गंगा नदी के जिस घाट पर आप जी खेलते व स्नान करते थे, उसका नाम गोबिंद घाट प्रसिद्ध है|