BALAJI KI JAI

पवित्र और चमत्कारिक मेहंदीपुर बालाजीमहराज की सम्पूर्ण कथा।

राजस्थान के सवाई माधोपुर और जयपुर की  सीमा रेखा पर स्थित मेंहदीपुर कस्बे में बालाजी का एक अतिप्रसिद्ध तथा प्रख्यात मन्दिर है जिसे "श्री मेंहदीपुर बालाजी मन्दिर" के नाम से जाना जाता है ।

भूत प्रेतादि ऊपरी बाधाओं के निवारणार्थ यहांँ आने वालों का ताँंता लगा रहता है। तंत्र मंत्रादि ऊपरी शक्तियों से ग्रसित व्यक्ति भी यहांँ पर बिना दवा और तंत्र मंत्र के स्वस्थ होकर लौटते हैं । सम्पूर्ण भारत से आने वाले  लगभग एक हजार रोगी और उनके  स्वजन यहाँं नित्य ही डेरा डाले रहते हैं ।

बालाजी का मन्दिर मेंहदीपुर नामक स्थान पर दो पहाड़ियों के बीच स्थित है, इसलिए इन्हें "घाटे वाले बाबा जी" भी कहा जाता है । इस मन्दिर में स्थित बजरंग बली की बालरूप मूर्ति किसी कलाकार ने नहीं बनाई, बल्कि यह स्वयंभू है । यह मूर्ति पहाड़ के अखण्ड भाग के रूप में मन्दिर की पिछली दीवार का कार्य भी करती है ।

इस मूर्ति को प्रधान मानते हुए बाकी मन्दिर का निर्माण कराया गया है । इस मूर्ति के सीने के बाईं तरफ़ एक अत्यन्त सूक्ष्म छिद्र है जिससे पवित्र जल की धारा निरंतर बह रही है।

I'mयह जल बालाजी के चरणों तले स्थित एक कुण्ड में एकत्रित होता रहता है जिसे भक्तजन चरणामृत के रूप में अपने साथ ले जाते हैं । यह मूर्ति लगभग 1000 वर्ष प्राचीन है किन्तु   मन्दिर का निर्माण इसी सदी में कराया गया है । मुस्लिम शासनकाल में कुछ बादशाहों ने इस मूर्ति को नष्ट करने की कुचेष्टा की, लेकिन वे असफ़ल रहे ।

वे इसे जितना खुदवाते गए मूर्ति की जड़ उतनी ही गहरी होती चली गई । थक हार कर उन्हें अपना यह कुप्रयास छोड़ना पड़ा । ब्रिटिश शासन के दौरान सन 1910  में बालाजी ने अपना सैकड़ों वर्ष  पुराना चोला स्वतः  ही त्याग दिया । भक्तजन इस चोले को लेकर समीपवर्ती मंडावर रेलवे स्टेशन पहुंँचे, जहांँ से उन्हें चोले को गंगा में प्रवाहित करने जाना था ।

ब्रिटिश स्टेशन मास्टर ने चोले को निःशुल्क ले जाने से रोका और उसका वजन करने लगा, लेकिन चमत्कारी चोला कभी मन भर ज्यादा हो जाता और कभी दो मन कम हो जाता । असमंजस में पड़े स्टेशन मास्टर को अंततः चोले को बिना लगेज ही जाने देना पड़ा और उसने भी बालाजी के चमत्कार को नमस्कार किया ।

इसके बाद बालाजी को नया चोला चढाया गया । यज्ञ हवन और ब्राह्मण भोज एवं धर्म ग्रन्थों का पाठ किया गया । एक बार फ़िर से नए चोले से एक नई ज्योति दीप्यमान हुई । यह ज्योति सारे विश्व का अंधकार दूर करने में सक्षम है । बालाजी महाराज के अलावा यहांँ श्री प्रेतराज सरकार और श्री कोतवाल कप्तान ( भैरव ) की मूर्तियांँ भी हैं ।

प्रेतराज सरकार जहां द्ण्डाधिकारी के पद पर आसीन हैं वहीं भैरव जी कोतवाल के पद पर । यहां आने पर ही सामान्यजन को ज्ञात होता है कि भूत प्रेतादि किस प्रकार मनुष्य  को कष्ट पहुंँचाते हैं और किस तरह सहज ही उन्हें कष्ट बाधाओं से मुक्ति मिल जाती है । दुखी कष्टग्रस्त व्यक्ति को मंदिर पहुँचकर तीनों देवगणों को प्रसाद चढाना पड़ता है ।

बालाजी को लड्डू प्रेतराज सरकार को चावल और कोतवाल कप्तान (भैरव) को उड़द का प्रसाद चढाया जाता है । इस प्रसाद में से दो लड्डू रोगी को खिलाए जाते हैं और शेष प्रसाद पशु पक्षियों को डाल दिया जाता है । ऐसा कहा जाता है कि पशु पक्षियों के रूप में देवताओं के दूत ही प्रसाद ग्रहण कर रहे होते हैं । प्रसाद हमेशा थाली या दोने में रखकर दिया जाता है।

लड्डू खाते ही रोगी व्यक्ति झूमने लगता है और भूत प्रेतादि स्वयं ही उसके शरीर में आकर बड़बड़ाने लगते है । स्वतः ही वह हथकडी और बेड़ियों में जकड़ जाता है । कभी वह अपना सिर धुनता है कभी जमीन पर लोट पोट कर हाहाकार करता है । कभी बालाजी के इशारे पर पेड़  पर उल्टा लटक जाता है । कभी आग जलाकर उसमें कूद जाता है ।

कभी फाँसी या सूली पर लटक जाता है । मार से तंग आकर भूत प्रेतादि स्वतः ही बालाजी के चरणों में  आत्मसमर्पण कर देते हैं अन्यथा समाप्त कर दिये जाते हैं । बालाजी उन्हें अपना दूत बना लेते हैं। संकट टल जाने पर बालाजी की ओर से एक दूत मिलता है जोकि रोग मुक्त व्यक्ति को भावी घटनाओं के प्रति सचेत करता रहता है।

बालाजी महाराज के मन्दिर में प्रातः और सायं लगभग चार चार घंटे पूजा होती है । पूजा में भजन आरतियों और चालीसों का गायन होता है। इस समय भक्तगण जहांँ पंक्तिबद्ध हो देवताओं को प्रसाद अर्पित करते हैं वहीं भूत प्रेत से ग्रस्त रोगी चीखते चिल्लाते उलट पलट होते अपना दण्ड भुगतते हैं ।

बालाजी मंदिर में प्रेतराज सरकार दण्डाधिकारी पद पर आसीन हैं। प्रेतराज सरकार के विग्रह पर भी चोला चढ़ाया जाता है। प्रेतराज सरकार को दुष्ट आत्माओं को दण्ड देने वाले देवता के रूप में पूजा जाता है । 

भक्ति-भाव से उनकी आरती, चालीसा, कीर्तन, भजन आदि किए जाते हैं । बालाजी के सहायक देवता के रूप में ही प्रेतराज सरकार की आराधना की जाती है।
पृथक रूप से उनकी आराधना - उपासना कहीं नहीं की जाती, न ही उनका कहीं कोई मंदिर है। वेद, पुराण, धर्म ग्रन्थ आदि में कहीं भी प्रेतराज सरकार का उल्लेख नहीं मिलता। प्रेतराज श्रद्धा और भावना के देवता हैं।

कुछ लोग बालाजी का नाम सुनते ही चाैंक पड़ते हैं। उनका मानना है कि भूत-प्रेतादि बाधाओं से ग्रस्त व्यक्ति को ही वहाँ जाना चाहिए। ऐसा सही नहीं है। कोई भी - जो बालाजी के प्रति भक्ति-भाव रखने वाला है, इन तीनों देवों की आराधना कर सकता है। अनेक भक्त तो देश-विदेश से बालाजी के दरबार में मात्र प्रसाद चढ़ाने नियमित रूप से आते हैं।
किसी ने सच ही कहा है—"नास्तिक भी आस्तिक बन जाते हैं, मेंहदीपुर दरबार में ।"

प्रेतराज सरकार को पके चावल का भोग लगाया जाता है, किन्तु भक्तजन प्रायः तीनों देवताओं को बूंदी के लड्डुओं का ही भोग लगाते हैं और प्रेम-श्रद्धा से चढ़ा हुआ प्रसाद बाबा सहर्ष स्वीकार भी करते हैं।

कोतवाल कप्तान श्री भैरव देव भगवान शिव के अवतार हैं और उनकी ही तरह भक्तों की थोड़ी सी पूजा-अर्चना से ही प्रसन्न भी हो जाते हैं । भैरव महाराज चतुर्भुजी हैं। उनके हाथों में त्रिशूल, डमरू, खप्पर तथा प्रजापति ब्रह्मा का पाँचवाँ कटा शीश रहता है । वे कमर में बाघाम्बर नहीं, लाल वस्त्र धारण करते हैं। वे भस्म लपेटते हैं । उनकी मूर्तियों पर चमेली के सुगंध युक्त तिल के तेल में सिन्दूर घोलकर चोला चढ़ाया जाता है ।

शास्त्र और लोककथाओं में भैरव देव के अनेक रूपों का वर्णन है, जिनमें एक दर्जन रूप प्रामाणिक हैं।  श्री बाल भैरव और श्री बटुक भैरव, भैरव देव के बाल रूप हैं। भक्तजन प्रायः भैरव देव के इन्हीं रूपों की आराधना करते हैं । भैरव देव बालाजी महाराज की सेना के कोतवाल हैं।

इन्हें कोतवाल कप्तान भी कहा जाता है। बालाजी मन्दिर में आपके भजन, कीर्तन, आरती और चालीसा श्रद्धा से गाए जाते हैं । प्रसाद के रूप में आपको उड़द की दाल के बड़े और खीर का भोग लगाया जाता है। किन्तु भक्तजन बूंदी के लड्डू भी चढ़ा दिया करते हैं ।

सामान्य साधक भी बालाजी की सेवा-उपासना कर भूत-प्रेतादि उतारने में समर्थ हो जाते हैं। इस कार्य में बालाजी उसकी सहायता करते हैं। वे अपने उपासक को एक दूत देते हैं, जो नित्य प्रति उसके साथ रहता है।

कलियुग में बालाजी ही एकमात्र ऐसे देवता हैं , जो अपने भक्त को सहज ही अष्टसिद्धि, नवनिधि तदुपरान्त मोक्ष प्रदान कर सकते हैं।

Deep love

एक डलिया में संतरे बेचती बूढ़ी औरत से एक युवा अक्सर संतरे खरीदता ।अक्सर, खरीदे संतरों से एक संतरा निकाल उसकी एक फाँक चखता और कहता,
"ये कम मीठा लग रहा है, देखो !" बूढ़ी औरत संतरे को चखती और प्रतिवाद करती"ना बाबू मीठा तो है!"
वो उस संतरे को वही छोड़,बाकी संतरे ले गर्दन झटकते आगे बढ़ जाता।
युवा अक्सर अपनी पत्नी के साथ होता था,
एक दिन पत्नी नें पूछा "ये संतरे हमेशा मीठे ही होते हैं, पर यहbनौटंकी तुम हमेशा क्यों करते हो ?
"युवा ने पत्नी को एक मधुर मुस्कान के साथ बताया -
"वो बूढ़ी माँ संतरे बहुत मीठे बेचती है, पर खुद कभी नहीं खाती, इस तरह मै उसे संतरा खिला देता हूँ ।
एक दिन, बूढ़ी माँ से, उसके पड़ोस में सब्जी बेचनें वाली औरत ने सवाल किया, ये झक्की लड़का संतरे लेते इतनी चख चख करता है, पर संतरे तौलते
हुए मै तेरे पलड़े को देखती हूँ, तुम हमेशा उसकी चख चख में, उसे ज्यादा संतरे तौल देती है ।बूढ़ी माँ नें साथ सब्जी बेचने वाली से कहा "उसकी चख चख संतरे के लिए नहीं, मुझे संतरा खिलानें को लेकर होती है,
वो समझता है में उसकी बात समझती नही,मै बस उसका प्रेम देखती हूँ, पलड़ो पर संतरे अपनें आप बढ़ जाते हैं ।

मेरी हैसीयत से ज्यादा मेरी थाली मे तूने परोसा है.
तू लाख मुश्किलें भी दे दे मालिक, मुझे तुझपे भरोसा है.
एक बात तो पक्की है की छीन कर खानेवालों का कभी पेट नहीं भरता और बाँट कर खानेवाला कभी भूखा नहीं मरता...!!!

दिल को छू गया "ऊँचा उठने के लिए पंखो की जरूरत तो पक्षीयो को पड़ती है इंसान तो जितना नीचे झुकता है, वो उतना ही ऊपर उठता जाता है..!!"

Thankful to God

हमारे जीवन में कई बार ऐसा होता है कि हम चाह कर भी भूल नहीं पाते और हमेशा दिमाग में घूमती रहती हैं जैसे मेरे पिताजी की आदत भी अज़ीब थी।
खाना खाने बैठते तो एक निवाला तोड़ कर थाली के चारों ओर घूमाते और फिर उसे किनारे रख कर थाली को प्रणाम करते और खाना खाना शुरू करते।
मैं उन्हें ऐसा करते हुए देखता और सोचता कि पिताजी ऐसा क्यों करते हैं?
बहुत हिम्मत करके एक दिन मैंने उनसे पूछ लिया कि पिताजी, आप रोज एक निवाला अलग करके, खाने की थाली को प्रणाम क्यों करते हैं?
पिताजी मेरी ओर देख कर मुस्कुराने लगे। फिर उन्होंने कहा कि मैं खाने से पहले ईश्वर को धन्यवाद कहता हूं। धन्यवाद इस बात के लिए कि उन्हें खाना खाने को मिला। धन्यवाद इस बात के लिए भी कि वो खाना खाने के योग्य हैं। धन्यवाद इस बात के लिए भी खाना खाने योग्य है।
मैं बहुत छोटा था, समझ नहीं पा रहा था कि खाना तो मां ने बनाया है, फिर इसमें ईश्वर कहां से आ गए?
शायद पिताजी ने मेरी आंखों में सवाल को पढ़ लिया था।
उन्होंने मुझसे बहुत धीरे से कहा कि खाना बहुत अच्छा बना है, इसलिए अभी तुम्हारी मां यहां आएगी तो मैं उसे भी धन्यवाद कहूंगा।

मुझे  हर बात याद नहीं  रहती थी। पर मुझ यह बाते याद रह गई। पता नही क्यो???

जिस दिन मेरी मां दम तोड़ रही थी, उससे कुछ देर पहले उसने इशारे से पिताजी को अपने पास बुलाया था और कहा था कि आप मेरे मुंह में तुलसी का एक पत्ता और थोड़ा सा पानी डाल दीजिए। पिताजी ने ऐसा ही किया था।
पिताजी ने जैसे ही मां के मुंह में चम्मच से पानी डाला, मां मुस्कुराने लगी। उसने अपने दोनों हाथ जोड़े और फुसफुसाते हुए पिताजी को धन्यवाद कहा था।
मां जा रही थी। पूरा परिवार मां के बिस्तर के सामने खड़ा था। मां के चेहरे पर ज़रा भी शिकन नहीं नहीं थी। मां जाते हुए पिताजी का धन्यवाद करते हुए गई।
धन्यवाद इतने दिन साथ निभाने के लिए। धन्यवाद कैंसर जैसी बीमारी में सेवा करने के लिए।
बहुत ग़जब का था मां का संसार। जो मुझे उनके जाने के बाद हमेशा याद आता है

मेरी मां की मृत्यु के बाद जीवन से मेरा मोह भंग हो चला था। मेरी समझ में नहीं आ रहा था कि मुझे क्या करना है। मैं बहुत छोटा था। इतना छोटा कि मृत्यु का अर्थ भी ठीक से नहीं समझता था।
ऐसे में एक दिन पिताजी ने मुझे अपने पास बिठाया और कहने लगे कि तुम्हें उदास नहीं होना चाहिए। तुम्हें ज़िंदगी को समझने की कोशिश करनी चाहिए। तुम्हें यह समझना चाहिए कि तुम्हारी मां तुम्हारे साथ इतने वर्षों तक रही।
फिर पिताजी बताने लगे कि उनके पिताजी की जब मृत्यु हुई थी, तब उनकी उम्र तीन साल थी। कई चीजें ईश्वर जब तय करते हैं, तो उनकी अपनी योजना होती है। हमें ईश्वर के हर फैसले को स्वीकार करना चाहिए और उसका धन्यवाद कहना चाहिए कि वो हमारे लिए हर पल कुछ सोच रहे हैं।
मैंने पिताजी से कहा कि मां हमें छोड़ कर चली गई, इसमें धन्यवाद जैसी क्या बात हो सकती है?
मुझे नहीं याद कि पिताजी को कहां से मेरी वह डायरी मिल गई थी, जिसमें मैंने लिखा था कि हे भगवान मेरी मां को मृत्यु दे दो। पिताजी मुझे मेरी डायरी का वो पन्ना दिखाने लगे और उन्होंने कहा कि मां को कष्ट से मुक्ति मिली। इसके लिए भी तुम्हें धन्यवाद कहना चाहिए। इस संसार में बहुत से लोग इस बीमारी में बहुत कष्ट सहते रहते हैं। वो ईश्वर से मृत्यु की कामना करते हैं, ऐसे में मां चली गई, इसका अफसोस चाहे जितना हो, पर तुम्हें भगवान के प्रति आभार जताना चाहिए।

पिताजी ने जितना कुछ समझाया था, उसका निचोड़ इतना ही था कि हमें अपने भीतर धन्यवाद कहने का भाव विकसित करना चाहिए। हमें धन्यवाद कहना सीखना चाहिए।
हम स्वस्थ हैं। हमें दोनों वक्त खाना मिलता है। हमारे सिर पर छत है। हमारे पास बहुत सी ऐसी चीजें हैं, जो बहुत से लोगों के पास नहीं। हमें इसके लिए धन्यवाद कहना चाहिए। हमें धन्यवाद इसलिए कहना चाहिए क्योंकि इसी संसार में बहुत से लोग ऐसे भी हैं, जिनके पास वो नहीं, जो हमारे पास है। इस संसार में बहुत से लोगों के पास ऐसी चीजें हैं, जो हमारे पास नहीं। इसके लिए मन में मलाल रखने की जगह जो है, उसके लिए धन्यवाद कहना सीखना अधिक महत्वपूर्ण है।

मैंने कभी पिताजी को उदास नहीं देखा।
मैंने पिताजी से एक बार पूछा था कि क्या आप कभी दुखी नहीं होते, तो पिताजी ने मुझे एक फिल्मी गीत गुनगुना कर जीवन के सत्य को समझाया था- “मुझे ग़म भी उनका अज़ीज है कि ये उन्हीं की दी हुई चीज़ है।”
पिताजी ने इस गीत को गुनगुनाते हुए मुझे समझाया था कि ज़िंदगी बहुत आसान हो जाती है, अगर हम घटने वाली घटनाओं को ईश्वरीय विधान मान लें तो। वो मुझे समझाते थे कि बहुत छोटी-छोटी बातों में भी तुम अच्छाई ढूंढ सकते हो। एक बार अच्छाई ढूंढने की आदत पड़ जाती है, तो ज़िंदगी आसान हो जाती है।

Remember God always

मैं क्यों पापी!?

एक बार एक ऋषि ने सोचा कि लोग गंगा में पाप धोने जाते हैं, तो इसका मतलब हुआ कि सारे पाप गंगा में समा गए और गंगा भी पापी हो गई!

उसने यह जानने के लिए तपस्या की, कि पाप कहाँ जाते है?
   
तपस्या करने के फलस्वरूप देवता प्रकट हुए, ऋषि ने पूछा: 'भगवन, जो पाप गंगा में धोया जाता है वह पाप कहाँ जाता है?'

भगवान ने कहा: 'चलो गंगा से ही पूछते हैं'। दोनों लोग गंगा के पास गए और कहा:'हे गंगे!जो लोग तुम्हारे यहाँ पाप धोते हैं, तो इसका मतलब आप भी पापी हुई!'

गंगा ने कहा:'मैं क्यों पापी हुई, मैं तो सारे पापों को ले जाकर समुद्र को अर्पित कर देती हूं!'

अब वे लोग समुद्र के पास गए और पूछा:'हे सागर!गंगा जो पाप आपको अर्पित करती है तो इसका मतलब आप भी पापी हुए!'
समुद्र ने कहा:,'मैं क्यों पापी हुआ, मैं तो सारे पापों को भाप बना कर बादल बना देता हूँ!'

अब वे लोग बादल के पास गए और कहा,:हे बादलों!समुद्र जो पापों को भांप बनाकर बादल बना देते हैं, तो इसका मतलब आप पापी हुए!'

बादलों ने कहा:'मैं क्यों पापी हुआ, मैं तो सारे पापों को वापस पानी बरसा कर धरती पर भेज देता हूँ, जिससे अन्न उपजता है, जिसको मानव खाता है, उस अन्न में जो अन्न जिस मानसिक स्थिति से उगाया जाता है और जिस वृत्ति से प्राप्त किया जाता है,जिस मानसिक अवस्था में खाया जाता है, उसी अनुसार मानव की मानसिकता बनती है!'

शायद इसलिये कहते हैं

'जैसा  खायेंअन्न, वैसा बनता मन'
इसीलिये सदैव भोजन प्रभु सिमरन और शांत अवस्था में करना चाहिए और कम से कम जिस धन से अन्न  खरीदा जाए वह धन ईमानदारी एवं श्रम का होना चाहिए
क्योंकि हर एक बात हम नही कर सकते परंतु जितना हमारे हाथ में है उतना तो सच्चे दिल से व ईमानदारी से, प्रभु की याद में कर ही सकते हैं जिस से अपवित्र भी पवित्र बन जाये

ओम नमः शिवाय शिवजी सदा सहाय
ओम नमो शिवाय गुरूजी सदा सहाय

Birth story of Hanuman Ji

हनुमान जन्मोत्सव
   
पुंजिकस्थली देवराज इन्द्र की सभा में एक अप्सरा थी। एक बार जब दुर्वासा ऋषि इन्द्र की सभा में उपस्थित थे, तब अप्सरा पुंजिकस्थली बार-बार भीतर आ-जा रही थी। इससे रुष्ट होकर दुर्वासा ऋषि ने उसे वानरी हो जाने का शाप दे डाला। जब उसने बहुत अनुनय-विनय की, तो उसे इच्छानुसार रूप धारण करने का वर मिल गया। इसके बाद गिरज नामक वानर की पत्नी के गर्भ से इसका जन्म हुआ और 'अंजना' नाम पड़ा।

केसरी नाम के वानर से इनका
विवाह हुआ और इनके ही गर्भ से
वीर हनुमान का जन्म हुआ।

पुंजिकस्थली देवताओं के राजा इंद्र की प्रमुख अप्सराओं में से एक थी। एक दिन महर्षि दुर्वासा स्वर्ग में पधारे। सब के सब महर्षि के सम्मुख शांत खड़े थे, किंतु अप्सरा पुंजिकस्थली किसी कार्य से बार-बार सभा भवन से बाहर आ-जा रही थी। महर्षि को इसमें अपना कुछ निरादर प्रतीत हुआ और उन्होंने उसे शाप दे दिया-
'तू बंदरिया के समान चंचल है, अत: वानरी हो जा। अप्सरा पुंजिकस्थली ने महर्षि से क्षमा मांगी और अपने उद्धार की प्रार्थना की। वहाँ पर उपस्थित अन्य लोगों ने भी महर्षि की वंदना की और उनसे पुंजिकस्थली को क्षमादान देने की प्रार्थना की। अंतत: महर्षि ने शाप का परिहार किया कि-
भावार्थ
"तू स्वेछारूप धारण कर सकेगी और तीनों लोकों में तेरी गति होगी।"
बाद के समय में पुंजिकस्थली ने वानर श्रेष्ठ विरज की पत्नी के गर्भ से वानरी रूप में जन्म लिया। बड़ी होने पर पिता ने अपनी सुंदरी शीलवती पुत्री का विवाह महान पराक्रमी कपि शिरोमणी वानरराज केसरी से कर दिया।

एक बार घूमते हुए केसरी प्रभास तीर्थ के निकट पहुँचे। उन्होंने देखा कि बहुत-से ऋषि वहाँ एकत्र हैं। कोर्इ स्नान कर रहा है, कोर्इ तर्पण कर रहा है। कोर्इ सूर्य को को अर्ध्य दे रहा है और कोर्इ जल में खड़े-खड़े जप कर रहा है। कुछ साधु किनारे पर आसन लगाकर पूजा अर्चना कर रहे थे। उसी समय वहाँ एक विशाल हाथी आ गया और उसने ऋषियों को मारना प्रारंभ कर दिया। ऋषि भारद्वाज आसन पर शांत होकर बैठे थे, वह दुष्ट हाथी उनकी ओर झपटा। पास के पर्वत शिखर से केसरी ने हाथी को यूँ उत्पात मचाते देखा तो वे भयंकर गर्जना करते हुए हाथी पर कूद पड़े।

ठीक हाथी के उपर ही वे गिरे। बलपूर्वक उसके बड़े-बड़े दांत उन्होंने उखाड़ दिये और उसे मार डाला। हाथी के मारे जाने पर प्रसन्न होकर मुनी ने कहा- "पुत्र वर मांगो"। केसरी ने वरदान माँगा- "इच्छानुसार रूप धारण करने वाला, पवन के समान पराक्रमी तथा रुद्र के समान शत्रु के लिये काल पुत्र आप मुझे प्रदान करें।" ऋषियों ने 'एवमस्तु' कह दिया।
एक दिन अंजना मानव रूप धारण कर सुदर वस्त्रालंकार से सुसज्जित होकर पर्वत के शिखर पर विचरण कर रही थी। वे डूबते हुए सूरज की खूबसूरती को देखकर प्रसन्न हो रहीं थी। सहसा वायु वेग उनके समीप ही बढ़ गया। उनका वस्त्र कुछ उड़-सा गया। उन्होंने चारों तरफ गौर से देखा आस-पास के वृक्षों के पत्ते तक नहीं हिल रहे थे। उनके मन में विचार आया कि कोर्इ राक्षस अदृश्य होकर कोर्इ धृष्टता तो नहीं कर रहा।

अत: वे जोर से बोलीं- "कौन दुष्ट मुझ पतिपरायणा का अपमान करने की चेष्टा करता है?" सहसा सामने पवन देव प्रकट हो गये और बोले- "देवी, क्रोध न करें और मुझे क्षमा करें। जगत का श्वास रूप मैं पवन हूँ। अपके पति को ऋषियों ने मेरे समान पराक्रमी पुत्र होने का वरदान दिया है। उन्हीं महात्माओं के वचनों से विवश होकर मैंने आपके शरीर का स्पर्श किया है। मेरे अंश से आपको एक महातेजस्वी बालक प्राप्त होगा।

उन्होंने आगे कहा- "भगवान रुद्र मेरे स्पर्श द्वारा आप में प्रविस्ट हुए हैं। वही आपके पुत्र रूप में प्रकट होंगे।" वानरराज केसरी के क्षेत्र में भगवान रुद्र ने स्वयं अवतार धारण किया। रामदूत हनुमान ने माता अंजना की कोख से जन्म लिया।