Raksha Bandhan is Indian festival

Dear friends I am today giving you the reasons of celebrations of Raksha Bandhan in India which shows a great love and affection between brother and sister and proves that Indian culture is the best in the world which gives importance to everyone and without discrimination. Here I am giving you some pictures of this celebration which can give you feeling of happiness and pleasure.

Nature gives everything free

Nature is unique and amazing in every way because we have got everything free of cost after being civilized we have to pay money . There is beauty of nature found everywhere like mountains, rivers valleys, green trees, volcanoes and oceans. In the modern board everyone is very busy but when he gets time for Germany he feels freshness after any kind of journey and does his work with heat attention and enthusiasm. In man made world nature is always great in every respect which gives us relief and soothe  feeling of love and affection. In ancient days when people were living in forest and valleys they had great time for hunting and doing his  work with great attention. We must have time for recreation and travelling for feeling fresh and energetic.

Be kind and generous

We always consider human nature by his or her behavior.  sometime we find someone's behaviour is very unique in every kind of way like generous kind and sympathetic with everyone. History always prove that the great and generous person have won the world heart of people  with his nature and behaviour. Dictators and monarchy people are remembered only for their cruelity and  brutality. Merciless people are considered butcher and brutal person in the eyes of the world.

GOOD COMPANY IS BETTER

एक बार विश्वामित्र जी और वशिष्ठ जी में इस बात‌ पर बहस हो गई, कि सत्संग बड़ा है या तप?
विश्वामित्र जी ने कठोर तपस्या करके ऋध्दी-सिध्दियों को प्राप्त किया था,इसीलिए वे तप को बड़ा बता रहे थे।
जबकि वशिष्ठ जी सत्संग को बड़ा बताते थे।
वे इस बात का फैसला करवाने ब्रह्मा जी के पास चले गए।उनकी बात सुनकर ब्रह्मा जी ने कहा- मैं सृष्टि की रचना करने में व्यस्त हूं।आप विष्णु जी के पास जाइये।
विष्णु जी आपका फैसला अवश्य कर देगें।अब दोनों विष्णु जी के पास चले गए।विष्णु जी ने सोचा- यदि मैं सत्संग को बड़ा बताता हूं तो विश्वामित्र जी नाराज होंगे,
और यदि तप को बड़ा बताता हूं तो वशिष्ठ जी के साथ अन्याय होगा।इसीलिए उन्होंने भी यह कहकर उन्हें टाल दिया,कि मैं सृष्टि का पालन करने मैं व्यस्त हूं।आप शंकर जी के पास चले जाइये।अब दोनों शंकर जी के पास पहुंचे।शंकर जी ने उनसे कहा- ये मेरे वश की बात नहीं है।इसका फैसला तो शेषनाग जी कर सकते हैं।
अब दोनों शेषनाग जी के पास गए।
शेषनाग जी ने उनसे पूछा- कहो ऋषियों! कैसे आना हुआ।वशिष्ठ जी ने बताया- हमारा फैसला कीजिए,
कि तप बड़ा है या सत्संग बड़ा है?विश्वामित्र जी कहते हैं कि तप बड़ा है,और मैं सत्संग को बड़ा बताता हूं।
शेषनाग जी ने कहा- मैं अपने सिर पर पृथ्वी का भार उठाए हूं,यदि आप में से कोई भी थोड़ी देर के लिए पृथ्वी के भार को उठा ले,तो मैं आपका फैसला कर दूंगा।तप में अहंकार होता है,और विश्वामित्र जी तपस्वी थे।उन्होंने तुरन्त अहंकार में भरकर शेषनाग जी से कहा- पृथ्वी को आप मुझे दीजिए।विश्वामित्र ने पृथ्वी अपने सिर पर ले ली।अब पृथ्वी नीचे की और चलने लगी।शेषनाग जी बोले- विश्वामित्र जी! रोको।
पृथ्वी रसातल को जा रही है।विश्वामित्र जी ने कहा- मैं अपना सारा तप देता हूं पृथ्वी रूक जा।परन्तु पृथ्वी नहीं रूकी।ये देखकर वशिष्ठ जी ने कहा- मैं आधी घड़ी का सत्संग देता हूं,पृथ्वी माता रूक जा।पृथवी वहीं रूक गई।अब शेषनाग जी ने पृथ्वी को अपने सिर पर ले लिया,और उनको कहने लगे- अब आप जाइये।
विश्वामित्र जी कहने लगे- लेकिन हमारी बात का फैसला तो हुआ नहीं है।शेषनाग जी बोले- विश्वामित्र जी! फैसला तो हो चुका है।आपके पूरे जीवन का तप देने से भी पृथ्वी नहीं रूकी,और वशिष्ठ जी के आधी घड़ी के सत्संग से ही पृथ्वी अपनी जगह पर रूक गई।
फैसला तो हो गया है कि तप से सत्संग ही बड़ा होता है।
इसीलिए हमें नियमित रूप से सत्संग सुनना चाहिए।
कभी भी या जब भी, आस-पास कहीं सत्संग हो,
उसे सुनना और उस पर अमल करना चाहिए।
सत्संग की आधी घड़ी
तप के वर्ष हजार
तो भी नहीं बराबरी
संतन कियो विचार

GREATNESS OF SUDAMA

सुदामा को गरीबी क्यों मिली
अगर अध्यात्मिक दृष्टिकोण से देखा जाये तो सुदामा जी बहुत धनवान थे।जितना धन उनके पास था किसी के पास नहीं था ।लेकिन अगर भौतिक दृष्टि से देखा जाये तो सुदामाजी बहुत निर्धन थे ।आखिर क्यों
एक ब्राह्मणी थी जो बहुत निर्धन थी। भिक्षा माँग कर जीवन-यापन करती थी। एक समय ऐसा आया कि पाँच दिन तक उसे भिच्छा नहीं मिली।वह प्रति दिन पानी पीकर भगवान का नाम लेकर सो जाती थी।
छठवें दिन उसे भिक्षा में दो मुट्ठी चना मिले । कुटिया पे पहुँचते-पहुँचते रात हो गयी। ब्राह्मणी ने सोंचा अब ये चने रात मे नही खाऊँगी प्रात:काल वासुदेव को भोग लगाकर तब खाऊँगी ।यह सोंचकर ब्राह्मणी ने चनों को कपडे़ में बाँधकर रख दियाऔर वासुदेव का नाम जपते-जपते सो गयी  ब्राह्मणी के सोने के बाद कुछ चोर चोरी करने के लिए उसकी कुटिया मे आ गये।इधर उधर बहुत ढूँढा, चोरों को वह चनों की बँधी पुटकी मिल गयी । चोरों ने समझा इसमें सोने के सिक्के हैं । इतने मे ब्राह्मणी जाग गयी और शोर मचाने लगी ।
गाँव के सारे लोग चोरों को पकडने के लिए दौडे़। चोर वह पुटकी लेकर भागे।पकडे़ जाने के डर से सारे चोर संदीपन मुनि के आश्रम में छिप गये।संदीपन मुनि का आश्रम गाँव के निकट थाजहाँ भगवान श्री कृष्ण और सुदामा शिक्षा ग्रहण कर रहे थे
गुरुमाता को लगा कि कोई आश्रम के अन्दर आया है। गुरुमाता देखने के लिए आगे बढीं  तो चोर समझ गये कोई आ रहा है, चोर डर गये और आश्रम से भागे ! भागते समय चोरों से वह पुटकी वहीं छूट गयी।और सारे चोर भाग गये।इधर भूख से व्याकुल ब्राह्मणी ने जब जाना ! कि उसकी चने की पुटकी  चोर उठा ले गये ।
तो ब्राह्मणी ने श्राप दे दिया कि " मुझ दीनहीन असहाय के जो भी चने  खायेगा वह दरिद्र हो जायेगा "।
उधर प्रात:काल गुरु माता आश्रम मे झाडू़ लगाने लगीं तो झाडू लगाते समय गुरु माता को वही चने की पुटकी मिली । गुरु माता ने पुटकी खोल के देखी तो उसमे चने थे।सुदामा जी और कृष्ण भगवान जंगल से लकडी़ लाने जा रहे थे। रोज की तरह गुरु माता ने वह चने की पुटकी सुदामा जी को दे दी।और कहा बेटा ! जब वन मे भूख लगे तो दोनो लोग यह चने खा लेना ।सुदामा जी जन्मजात ब्रह्मज्ञानी थे। ज्यों ही  चने की पुटकी सुदामा जी ने हाथ में लिया त्यों ही उन्हे सारा रहस्य मालुम हो गया ।सुदामा जी ने सोचा ! गुरु माता ने कहा है यह चने दोनों लोग  बराबर बाँट के खाना।लेकिन ये चने अगर मैंने त्रिभुवनपति श्री कृष्ण को खिला दिये तो सारी शृष्टी दरिद्र हो जायेगी।नहीं-नहीं मैं ऐसा नही करुँगा। मेरे जीवित रहते मेरे प्रभु दरिद्र हो जायें मै ऐसा कदापि नही करुँगा ।मैं ये चने स्वयं खा जाऊँगा लेकिन कृष्ण को नहीं खाने दूँगा।और सुदामा जी ने सारे चने खुद खा लिए।दरिद्रता का श्राप सुदामा जी ने स्वयं ले लिया। चने खाकर।लेकिन अपने मित्र श्री कृष्ण को एक भी दाना चना नही दिया।