Millions of millions years have passed and human civilization comes into existence. Existence of God is eternal truth
Pics of Lord Krishna
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Good company removes darkness of mind
एक संत रोज अपने शिष्यों को गीता पढ़ाते थे। सभी शिष्य इससे खुश थे। लेकिन एक शिष्य चिंतित दिखा। संत ने उससे इसका कारण पूछा। शिष्य ने कहा- गुरुदेव, मुझे आप जो कुछ पढ़ाते हैं, वह समझ में नहीं आता। जबकि बाकी सारे लोग समझ लेते हैं। मैं इसी वजह से चिंतित और दुखी हूं। आखिर मुझे गीता का भाष्य क्यों समझ में नहीं आता? गुरु ने कहा- तुम कोयला ढोने वाली टोकरी में जल भर कर ले आओ। शिष्य चकित हुआ। आखिर टोकरी में कैसे जल भरेगा? लेकिन चूंकि गुरु ने यह आदेश दिया था, इसलिए वह टोकरी में नदी का जल भरा और दौड़ पड़ा। लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ। जल टोकरी से छन कर गिर पड़ा। उसने टोकरी में जल भर कर कई बार गुरु जी तक दौड़ लगाई। लेकिन टोकरी में जल टिकता ही नहीं था। तब वह अपने गुरुदेव के पास गया और बोला- गुरुदेव, टोकरी में पानी ले आना संभव नहीं। कोई फायदा नहीं। गुरु बोले- फायदा है। तुम जरा टोकरी में देखो। शिष्य ने देखा- बार- बार पानी में कोयले की टोकरी डुबाने से स्वच्छ हो गई है। उसका कालापन धुल गया है। गुरु ने कहा- ठीक जैसे कोयले की टोकरी स्वच्छ हो गई और तुम्हें पता भी नहीं चला। उसी तरह satsang बार- बार सुनने से खूब फायदा होता है। भले ही अभी तुम्हारी समझ में नहीं आ रहा है। लेकिन तुम इसका फायदा बाद में महसूस करोगे।
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Good nurturing and affection
एक पिता-पुत्र व्यापार धंधा करते थे। पुत्र को पिता के साथ कार्य करते हुए वर्षों बीत गये, उसकी उम्र भी चालीस को छूने लगी। फिर भी पुत्र को पिता न तो व्यापार की स्वतन्त्रता देते थे और न ही तिजोरी की चाबी। पुत्र के मन में सदैव यह बात खटकती। वह सोचता, "यदि पिता जी का यही व्यवहार रहा तो मुझे व्यापार में कुछ नया करने का कोई अवसर नहीं मिलेगा
पुत्र के मन में छुपा क्षोभ एक दिन फूट पड़ा। दोनों के बीच झगड़ा हुआ और सम्पदा का बँटवारा हो गया। पिता पुत्र दोनों अलग हो गये। पुत्र अपनी पत्नी, बच्चों के साथ रहने लगा। पिता अकेले थे, उनकी पत्नी का देहांत हो चुका था। उन्होंने किसी दूसरे को सेवा के लिए नहीं रखा क्योंकि उन्हें किसी पर विश्वास नहीं था। वे स्वयं ही रूखा-सूखा भोजन बनाकर खा लेते या कभी चने आदि खाकर ही रह जाते तो कभी भूखे ही सो जाते थे।उनकी पुत्रवधु बचपन से ही सत्संगी थी। जब उसे अपने ससुर की ऐसी हालत का पता चला तो उसे बड़ा दुःख हुआ, आत्मग्लानि भी हुई। उसमें बाल्यकाल से ही धर्म के संस्कार थे, बड़ों के प्रति आदर व सेवा का भाव था। उसने अपने पति को मनाने का प्रयास किया परंतु वे न माने। पिता के प्रति पुत्र के मन में सदभाव नहीं था। अब पुत्रवधु ने एक विचार अपने मन में दृढ़ कर उसे कार्यान्वित किया। वह पहले पति व पुत्र को भोजन कराकर क्रमशः दुकान और विद्यालय भेज देती, बाद में स्वयं ससुर के घर जाती।भोजन बनाकर उन्हें खिलाती और रात्रि के लिए भी भोजन बनाकर रख देती। कुछ दिनों तक ऐसा ही चलता रहा। जब उसके पति को पता चला तो उसने पत्नी को ऐसा करने से रोकते हुए कहाः "ऐसा क्यों करती हो ? बीमार पड़ जाओगी। तुम्हारा शरीर इतना परिश्रम नहीं सह पायेगा।" पत्नी बोली "मेरे आदरणीय ससुरजी भूखे रहें तकलीफ पायें और हम लोग आराम से खायें-पियें, यह मैं नहीं देख सकती
मेरा धर्म है बड़ों की सेवा करना, इसके बिना मुझे संतोष नहीं होता। उनमें भी तो मेरे भगवान का वास है। मैं उन्हें खिलाये बिना नहीं खा सकती। भोजन के समय उनकी याद आने पर मेरी आँखों में आँसू आ जाते हैं। उन्होंने ही तो आपको पाल-पोसकर बड़ा किया है, तभी आप मुझे पति के रूप में मिले हैं। आपके मन में कृतज्ञता का भाव नहीं है तो क्या हुआ, मैं उनके प्रति कैसे कृतघ्न कैसे हो सकती हूँ।पत्नी के सुंदर संस्कारों ने, सदभाव ने पति की बुद्धि पलट दी। उन्होंने जाकर अपने पिता के चरण छुए, क्षमा माँगी और उन्हें अपने घर ले आये। पति पत्नी दोनों मिलकर पिता की सेवा करने लगे। पिता ने व्यापार का सारा भार पुत्र पर छोड़ दिया। परिवार के किसी भी व्यक्ति में सच्चा सदभाव है, मानवीय संवेदनाएँ हैं, सुसंस्कार हैं तो वह सबके मन को जोड़ सकता है, घर-परिवार में सुख शांति बनी रह सकती है। और यह तभी सम्भव है जब जीवन में सत्संग हो, भारतीय संस्कृति के उच्च संस्कार हों, धर्म का सेवन हो
जीवन का ऐसा कौन-सा क्षेत्र है जहाँ सत्संग की आवश्कता नहीं है ! सत्संग जीवन की अत्यावश्यक माँग है क्योंकि सच्चा सुख जीवन की माँग है और वह सत्संग से ही मिल सकता है।
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Forgiveness is best
हम परमात्मा की पूजा अर्चना में जितना समय लगाते हैं , 24 घंटों में बस वही पल सार्थक होते हैं। उन क्षणों में हमारी बुद्धि सात्विक रहती है। हम अपनी दुष्प्रवृत्तियों से दूर रहते हैं। शेष सारा समय तो सांसारिकता में ही बीतता है। पूरी दिनचर्या में जाने-अनजाने ही हमसे बहुत सी गलतियां होती रहती हैं। प्रयास तो ऐसा होना चाहिए कि ये त्रुटियां कम से कम हों , लेकिन जो भूलवश हो जाएं , उनके लिए क्षमायाचना करनी जरूरी है। त्रुटियों का प्रायश्चित करने के लिए आवश्यक है कि हम उस परमपिता से क्षमायाचना करें , जिसने इस समूचे संसार की रचना की है। इसी के साथ-साथ यह भी जरूरी है कि हम इस बात का ख्याल रखें कि उन गलतियों की पुनरावृत्ति न हो। इसके लिए हमें अत्यधिक सावधान और सचेष्ट रहना चाहिए। पूजा के प्रारंभ में गणेश की वंदना तथा अंत में आरती , शांति पाठ तथा क्षमायाचना की जाती है। इसके अंतर्गत देव अपराध समापन स्त्रोत का पाठ किया जाता है। श्री दुर्गा सप्तशती आदि ग्रंथों के अंत में यह विस्तार से दिया गया होता है। इसका अर्थ यही है कि हमें मंत्रों तथा पूजन आदि के बारे में ठीक से नहीं पता है , अत: कृपा पूर्वक हमारे अपराध क्षमा करो। अपने प्रभु से क्षमायाचना करने का सबसे बड़ा लाभ यह है कि यह भक्त के अंदर याचक होने का भाव भरता है। हमारे दर्प भरे मस्तक को सबसे बड़े दाता के दर पर झुका देता है। हमारे प्राचीन मनीषियों ने हमारे अहंकार को तोड़ने के लिए ही यह उपाय खोजा था कि हम केवल प्रार्थना , उपासना और आराधना ही नहीं , बल्कि साथ में ईश्वर से अपने अपराधों के प्रति क्षमा याचना भी अवश्य करें। अपनी गलती को स्वीकारने और उसके लिए क्षमा मांगने में संकोच न करें। वस्तुत: अहंकार क्षमा का शत्रु है। यदि तनिक सा भी अहंकार हमारे मन के किसी कोने में शेष है , तो हम किसी को क्षमा नहीं कर सकते और ऐसे में क्षमा याचना करने का तो प्रश्न ही नहीं उठता। याद रहे , जो किसी को क्षमा नहीं करता , वह क्षमा याचना करने का भी अधिकारी नहीं हो सकता। इसलिए क्षमायाचना वही कर सकता है , जो सभी को क्षमा करना जानता हो अर्थात क्षमा करना जिसके स्वभाव का अंग हो। इसके लिए विनम्रता और सहनशीलता की आवश्यकता पड़ती है। इसीलिए जैन मत में क्षमा का इतना महत्व है कि इसके लिए विशेष रूप से क्षमावणी दिवस मनाया जाता है। ईश्वर के यहां हमारी क्षमा याचना तभी स्वीकार होती है , जबकि हम खुद दूसरों को क्षमा करते हों और भूल जाते हों। ईश्वर तो बहुत दयावान है। वह हमारी असंख्य त्रुटियों को क्षमा करता है। इसीलिए यदि हम क्षमा करने का दिव्य गुण सीख लेते हैं , तो ईश्वर भी हमें क्षमा करने में उदार हो जाता है। किंतु ध्यान रहे कि गुनाह , गलती तथा भूल में बहुत अंतर है। भूल , असावधानी का परिणाम है। गलती अनजाने में होती है , लेकिन गुनाह जान-बूझकर किया जाता है। परमात्मा से पूजा-अर्चन करते समय हमें इन तीनों के बारे में ही क्षमा याचना अवश्य करनी चाहिए। अन्यथा बुद्धि आत्मनिष्ठ नहीं हो पाती। भ्रांति , जड़ता और अहंकार आदि दोष दूर नहीं होते। परमात्मा की समीपता प्राप्त नहीं होती , अत: परमानंद की अनुभूति होने का तो कोई प्रश्न ही नहीं उठता। परिणामत: सारी आध्यात्मिक यात्रा ही अधूरी रह जाती है। विभिन्न धर्मों में उपासना की पद्धतियां अलग-अलग हैं। इन सबके बावजूद कोई भी , कभी भी , कहीं भी , किसी तरह से भी अपने इष्ट , आराध्य का नाम ले सकता है। उसका ध्यान और सुमिरन कर सकता है , उसमें खो सकता है। परमात्मा सबकी सुनता है , बशर्ते हमारे अंदर पात्रता हो। अपनी पूजा-अर्चना में किसी कमी या भूल-चूक से वह कभी रुष्ट या क्रुद्ध नहीं होता। ये सब बातें तो मानव स्वभाव का हिस्सा हैं। क्षमायाचना करके हम मुक्त हो जाते हैं। प्रतिशोध की ज्वाला जब तक हृदय में शांत न हो जाए , तब तक श्रद्धा और भक्ति के अंकुर नहीं फूटते हैं। असहिष्णुता के बंधन नहीं टूटते हैं। इसलिए भक्त को सर्वप्रथम क्षमाशील तथा क्षमायाची बनना पड़ता है। क्षमाहीन के अपराध कभी क्षम्य नहीं होते। इसलिए अध्यात्म के मार्ग पर चलने वालों को जैसे को तैसा , ईंट का जवाब पत्थर से देने तथा धूल चटाने जैसे कुभावों को अपने हृदय से निकाल देना चाहिए।
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Real and practical knowledge
उस पांच सितारा ऑडिटोरियम के बाहर प्रोफेसर साहब की आलीशान कार आकर रुकी,प्रोफेसर बैठने को हुए ही थे कि एक सभ्य सा युगल याचक दृष्टि से उन्हें देखता हुआ पास आया और बोला ," साहब,यहां से मुख्य सड़क तक कोई साधन उपलब्ध नही है।मेहरबानी करके वहां तक लिफ्ट दे दीजिए।आगे हम बस पकड़ लेंगे।" रात के साढ़े ग्यारह बजे प्रोफेसर साहब ने गोद मे बच्चा उठाये इस युगल को देख अपने "तात्कालिक कालजयी" भाषण के प्रभाव में उन्हें अपनी कार में बिठा लिया । ड्राइवर कार दौड़ाने लगा। याचक जैसा वह कपल अब कुटिलतापूर्ण मुस्कुराहट से एक दूसरे की आंखों में देख अपना षड्यंत्र लागू करने लगा । पुरुष ने सीट के पॉकेट मे रखे मूंगफली के पाउच निकालकर खाना शुरू कर दिया प्रोफेसर से बिना पूछे मांगे ।लड़की भी बच्चे को छोड़ कार की तलाशी लेने लगी।एक शानदार ड्रेस दिखी तो उसने झट से उठा ली और अपने पर लगा कर देखने लगी ।प्रोफेसर साहब अब सहन नही कर सकते थे ड्राइवर से बोले गाड़ी रोको ,लेकिन ड्राइवर ने गाड़ी नही रोकी बस एक बार पीछे पलटकर देखा,प्रोफेसर को झटका लगा ,अरे ये कौन है उनके ड्राइवर के वेश में ? वे तीनों वहशियाना तरीके से हंसने लगे। प्रोफेसर साहब को अपने इष्टदेव याद आने लगे ,थोड़ा साहस एकत्रित करके प्रोफेसर साहब ने शक्ति प्रयोग का "अभ्यासहीन " प्रयास करने का विचार किया लेकिन तब तक वह पुरुष अपनी जेब से एक लाइटर जैसा पदार्थ निकाल चुका था और उसका एक बटन दबाते ही 4 इंच का धारदार चाकू बाहर आ चुका था प्रोफेसर साहब की क्रांति समयपूर्व ही गर्भपात को प्राप्त हुई ।प्रोफेसर साहब समझ चुके थे कि आज कोई बड़ी अनहोनी निश्चित है उन्होंने खुद ही अपना पर्स निकालकर सारे पैसे उस व्यक्ति के हाथ में थमा दिये।लेकिन वह व्यक्ति अब उनके आभूषणों की तरफ देखने लगा,दुखी मन से प्रोफेसर साहब ने अपनी अंगूठियां ,ब्रेसलेट और सोने के चेन उतार के उसके हाथ में धर दिए,अब वह व्यक्ति उनके गले में एक और लॉकेट युक्त चैन की तरफ हाथ बढ़ाने लगा । प्रोफेसर साहब याचना पूर्वक बोले - इसे छोड़ दो प्लीज यह मेरे "पुरुखों की निशानी " है जो कुल परंपरा से मुझ तक आई है। इसकी मेरे लिए अत्यंत भावनात्मक महत्ता है । लेकिन वह लुटेरा कहां मानने वाला था उसने आखिर वह निशानी भी उतार ही ली ।बिना प्रोफ़ेसर साहब के पता बताएं वे लोग उनके आलीशान बंगले के बाहर तक पहुंच गए थे।युवक बोला ," लो आ गया घर ,ऐसे ढेर सूखे मेवे,कपड़े , पैसा और प्रोफेसर साहब की ल..। उसकी आँखों मे आई धूर्ततापूर्ण बेशर्म चमक ने शब्द के अधूरेपन को पूर्णता दे दी ।प्रोफेसर साहब अब पूरे परिवार की सुरक्षा एवं घर पर पड़े अथाह धन-धान्य को लेकर भी चिंतित हो गये उनका रक्तचाप उछाले मारने लगा लेकिन करें भी तो क्या ?लगे गिड़गिड़ाने ," भैया मैंने आपको विपत्ति में देखकर शरण दी और आप मेरा ही इस तरह शोषण कर रहे हैं यह अनुचित है।ईश्वर का भय मानिए यह निर्दयता की पराकाष्ठा है ।अब तो छोड़ दीजिए मुझे भगवान के लिए ।प्रोफेसर फूट फूट कर रोने लगे ।।वे पति पत्नी अपना बच्चा लेकर कार से उतर गये और वह ड्राइवर भी,उनके द्वारा लिया गया सारा सामान उन्होंने वापस प्रोफेसर साहब के हाथ में पकड़ाया और बोले " क्षमा कीजिएगा सर ! रोहिंग्या मुसलमानों के विषय मे शरणागत वत्सलता पर आज आपके द्वारा उस ऑडिटोरियम मे दिए गए "अति भावुक व्याख्यान" का तर्कसंगत शास्त्रीय निराकरण करने की योग्यता हममें नहीं थी अतः हमें यह स्वांग रचना पड़ा । "आप जरा खुद को भारतवर्ष और हमें रोहिंग्या समझ कर इस पूरी घटना पर विचार कीजिए और सोचिये की आपको अब क्या करना चाहिए इस विषय पर। वो मूंगफली नही इस देश का अथाह प्राकृतिक संसाधन है जिसकी रक्षार्थ यहां के सैनिक अपना लहू बहाकर करते है सर ,मुफ्त नही है यह ।
वो आपकी बेटी या बेटे की ड्रेस मात्र कपड़ा नही है इस देश के नागरिकों के स्वप्न है भविष्य के जिसके लिए यंहा के युवा परिश्रम का पुरुषार्थ करते है ,मुफ्त नही है यह ।आपकी बेटी या पत्नी मात्र नारी नही है देश की अस्मिता है सर जिसे हमारे पुरुखों ने खून के सागर बहा के सुरक्षित रखा है,खैरात में बांटने के लिए नही है यह ।
आपका ये पर्स अर्थव्यवस्था है सर इस देश की जिसे करोड़ो लोग अपने पसीने से सींचते है।मुफ्त नही है ये। और आपके पुरुखों की निशानी यह चैन मात्र सोने का टुकड़ा नही है सर, अस्तित्व है हमारा, इतिहास है इस महान राष्ट्र का जिसे असंख्य योद्धाओ ने मृत्यु की बलिवेदी पर ढेर लगाकर जीवित रखा है। मुफ्त तो छोड़िए इसे किसी ग्रह पर कोई वैज्ञानिक भी उत्पन्न नही कर सकते । कुछ विचार कीजिये सर ! कौन है जो खून चूसने वाली जोंक को अपने शरीर पर रहने की अनुमति देता है ।एक बुद्धिहीन चौपाया भी तत्काल उसे पेड़ के तने से रगड़ कर उससे मुक्ति पा लेता है ।
उस युवक ने वह लाइटर जैसा रामपुरी चाकू प्रोफेसर साहब के हाथ में देते हुए कहा यह मेरी प्यारी बहन जो आपकी पुत्री है उसे दे दीजिएगा सर क्योंकि अगर आप जैसे लोग लुटेरों को सपोर्ट देकर इस देश में बसाते रहे तो किसी न किसी दिन ऐसी ही किसी कार में आपकी बेटी को इसकी आवश्यकता जरूर पड़ेगी।
सर ज्ञान के विषय मे तो हम आपको क्या समझा सकते हैं लेकिन एक कहानी जरूर सुनिए ,
"लाक्षाग्रह के बाद बच निकले पांडव एकचक्रा नगरी में गए थे तब वहा कोई सराय वगैरह तो थी नहीं तो वे लोग एक ब्राह्मणि के घर पहुंचे और उन्हें शरण देने के लिए याचना की ।शरणागत धर्म के चलते हैं उस ब्राह्मणि ने उन्हें शरण दी ,शीघ्र ही उन्हें (पांडवो) को पता चला कि यहां एक बकासुर नामक राक्षस प्रत्येक पक्षांत पर एक व्यक्ति को बैलगाड़ी भरकर भोजन के साथ खा जाता है और इस बार उसी ब्राह्मणी के इकलौते पुत्र की बारी थी , उस ब्राह्मणि के शरणागत धर्म के निष्काम पालन से प्रसन्न पांडवों ने धर्म की रक्षा के लिए , निर्बलों की सहायता के लिए और अपने शरण प्रदाता के ऋण से हल्के होने के लिए स्वयं भीम को उस ब्राह्मण के स्थान पर भेजा । आगे सभी को पता ही है की भीम ने उस राक्षस कोे किस तरह पटक-पटक कर धोया था लेकिन यह कहानी हमें सिखाती है की शरण किसे दी जाती है ?"जो आपके आपत्तिकाल मे आपके बेटे के बदले अपने बेटे को मृत्यु के सम्मुख प्रस्तुत कर सके वही शरण का सच्चा अधिकारी है । "उसी के लिए आप अपने संसाधन अपना हित अपना सर्वस्व त्याग करके उसे अपने भाई के समान शरण देते हैं और ऐसे कई उदाहरण इतिहास में उपलब्ध है ।
प्रोफेसर साहब ! ज्ञान वह नहीं है जो किताबें पढ़कर आता है , सद्ज्ञान वह है जो ऐतिहासिक घटनाएं सबक के रूप में हमें सीखाती हैं और वही वरेण्य है । वरना कई पढ़े-लिखे महामूर्धन्य लोगों के मूर्खतापूर्ण निर्णयो का फल यह पुण्यभूमि आज भी भुगत ही रही है। आशा है आप हमारी इस धृष्टता को क्षमा करके हमारे संदेश को समझ सकेंगे । प्रोफेसर साहब एक दीर्घनिश्वास के साथ उन्हें जाते हुए देख रहे थे। आज वे ज्ञान का एक विशिष्ट प्रकाश अपने अंदर स्पष्ट देख पा रहे थे ।
जय सनातन।।
।।नीतिवान लभते सुखं ।।
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