होली रंगों का त्यौहार































































बेटियां भगवान का उपहार

एक पिता ने अपनी बेटी की सगाई करवाई~~!!

लड़का बड़े अच्छे घर से था!
तो पिता बहुत खुश हुए!
लड़के ओर लड़के के माता पिता का स्वभाव~~!!
बड़ा अच्छा था!
तो पिता के सिर से बड़ा बोझ उतर गया~~!!
एक दिन शादी से पहले!
लड़के वालो ने लड़की के पिता को खाने पे बुलाया~~!!

पिता की तबीयत ठीक नहीं थी~~!!
फिर भी वह ना न कह सके!
लड़के वालो ने बड़े ही आदर सत्कार से उनका स्वागत किया~~!!
फ़िर लडकी के पिता के लिए चाय आई~~!!
शुगर कि वजह से लडकी के पिता को चीनी वाली चाय से दुर रहने को कहा गया था~~!!

लेकिन लड़की के होने वाली ससुराल घर में थे तो चुप रह कर चाय हाथ में ले ली~~!!
चाय कि पहली चुस्की लेते ही वो चोक से गये!चाय में चीनी बिल्कुल ही नहीं थी~~!!
और इलायची भी डली हुई थी!

वो सोच मे पड़ गये कि ये लोग भी हमारी जैसी ही चाय पीते हैं~~!!

दोपहर में खाना खाया वो भी बिल्कुल उनके घर जैसा दोपहर में आराम करने के लिए दो तकिये पतली चादर!उठते ही सोंफ का पानी पीने को दिया गया~~!!

वहाँ से विदा लेते समय उनसे रहा नहीं गया तो पुछ बैठे मुझे क्या खाना है~~!!
क्या पीना है!मेरी सेहत के लिए क्या अच्छा है!
ये परफेक्टली आपको कैसे पता है!
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तो बेटी कि सास ने धीरे से कहा कि कल रात को ही आपकी बेटी का फ़ोन आ गया था~~!!

ओर उसने कहा कि मेरे पापा स्वभाव से बड़े सरल हैं!
बोलेंगे कुछ नहीं प्लीज अगर हो सके!
तो आप उनका ध्यान रखियेगा!
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पिता की आंखों मे वहीँ पानी आ गया था~~!!
लड़की के पिता जब अपने घर पहुँचे तो घर के हाल में लगी अपनी स्वर्गवासी माँ के फोटो से हार निकाल दिया~~!!

जब पत्नी ने पूछा कि ये क्या कर रहे हो!
तो लडकी का पिता बोले-मेरा ध्यान रखने वाली मेरी माँ इस घर से कहीं नहीं गयी है~~!!
बल्कि वो तो मेरी बेटी!
के रुप में इस घर में ही रहती है!

और फिर पिता की आंखों से आंसू झलक गये ओर वो फफक कर रो पड़े~~!!

दुनिया में सब कहते हैं ना!
कि बेटी है~~!!
एक दिन इस घर को छोड़कर चली जायेगी!

मगर मैं दुनिया के सभी माँ-बाप से ये कहना चाहता हूँ~~!!
कि बेटी कभी भी अपने माँ-बाप के घर से नहीं जाती~~!!
बल्कि वो हमेशा उनके दिल में रहती है~~!!-
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अहंकार विनाश करता है

अहंकार विनाश करता है

अशोक के जीवन में मैंने पढ़ा है, गांव में एक भिक्षु आता था। अशोक गया और उस भिक्षु के चरणों में सिर रख दिया।

अशोक के बड़े आमात्य, वह जो बड़ा वजीर था अशोक का, उसे यह अच्छा नहीं लगा। अशोक जैसा सम्राट गांव में भीख मांगते एक भिखारी के पैरों पर सिर रखे! बहुत......घर लौटते ही, महल लौटते ही उसने कहा कि नहीं सम्राट, यह मुझे ठीक नहीं लगा। आप जैसा सम्राट, जिसकी कीर्ति शायद जगत में कोई सम्राट नहीं छू सकेगा फिर, वह एक साधारण से भिखारी के चरणों पर सिर रखे!

अशोक हंसा और चुप रह गया। महीने भर, दो महीने बीत जाने पर उसने बड़े वजीर को बुलाया और कहा कि एक काम करना है। कुछ प्रयोग करना है, तुम यह सामान ले जाओ और गांव में बेच आओ। सामान बड़ा अजीब था। उसमें बकरी का सिर था, गाय का सिर था, आदमी का सिर था, कई जानवरों के सिर थे और कहा कि जाओ बेच आओ बाजार में।

वह वजीर बेचने गया। गाय का सिर भी बिक गया और घोड़े का सिर भी बिक गया, सब बिक गया, वह आदमी का सिर नहीं बिका। कोई लेने को तैयार नहीं था कि इस गंदगी को कौन लेकर क्या करेगा? इस खोपड़ी को कौन रखेगा? वह वापस लौट आया और कहने लगा कि महाराज! बड़े आश्चर्य की बात है, सब सिर बिक गए हैं, सिर्फ आदमी का सिर नहीं बिक सका। कोई नहीं लेता है।

सम्राट ने कहा कि मुफ्त में दे आओ। वह वजीर वापस गया और कई लोगों के घर गया कि मुफ्त में देते हैं इसे, इसे आप रख लें। उन्होंने कहा. पागल हो गए हो! और फिंकवाने की मेहनत कौन करेगा? आप ले जाइए। वह वजीर वापस लौट आया और सम्राट से कहने लगा कि नहीं, कोई मुफ्त में भी नहीं लेता।

अशोक ने कहा कि अब मैं तुमसे यह पूछता हूं कि अगर मैं मर जाऊं और तुम मेरे सिर को बाजार में बेचने जाओ तो कोई फर्क पड़ेगा? वह वजीर थोड़ा डरा और उसने कहा कि मैं कैसे कहूं क्षमा करें तो कहूं। नहीं, आपके सिर को भी कोई नहीं ले सकेगा। मुझे पहली दफा पता चला कि आदमी के सिर की कोई भी कीमत नहीं है।

उस सम्राट ने कहा, उस अशोक ने कि फिर इस बिना कीमत के सिर को अगर मैंने एक भिखारी के पैरों में रख दिया था तो क्यों इतने परेशान हो गए थे तुम।

आदमी के सिर की कीमत नहीं, अर्थात आदमी के अहंकार की कोई भी कीमत नहीं है। आदमी का सिर तो एक प्रतीक है आदमी के अहंकार का,। और अहंकार की सारी चेष्टा है भीतर लाने की और भीतर कुछ भी नहीं जाता—न धन जाता है, न त्याग जाता है, न ज्ञान जाता है। कुछ भी भीतर नहीं जाता। बाहर से भीतर ले जाने का उपाय नहीं है। बाहर से भीतर ले जाने की सारी चेष्टा खुद की आत्महत्या से ज्यादा नहीं है, क्योंकि जीवन की धारा सदा भीतर से बाहर की ओर है।

 प्रभु की पगडंडियां