गृहणी का अति सुन्दर चित्रण
एक महिला से जब किसी ने पूछा की
"आप कार्यरत नारी हो"
या
"गृहणी?"
तब उसने जो जवाब दिया
सचमुच दिल को छु लेने वाला था।
मै पूर्ण समय कार्यरत गृहणी हूँ
सुबह मै "सभी को जगाने वाली" हूँ
मै घर की "रसोइया"
"सेवक"
"नौकर" हूँ
"अल्पकालिक धोबिन" हूं
"सिलाई वाली" "कामवाली बाई" हूँ
मै बच्चों की "शिक्षक" हूँ
घर के बड़े-बुजुर्गों की "सेवक" हूँ
मै घर मे हर वक्त हाजिर हूँ
घर की "रक्षक" हूँ
मेहमानों के लिये "परिचारिका" हूँ ,
कार्यक्रम मे "सजधज" कर जाती"बहू का चेहरा" हूँ ।
अपने पति के लिये "मित्र" "प्रेमिका" और "पत्नी" हूँ अपने बच्चों के लिये तो जैसे "अलादीन का चिराग" हूँ
मेरे कोई "कार्य करने का समय" निर्धरित नही होते।
न कोई "छुट्टी" मै कोई "वेतन" "भत्ता" नही लेती, न "पद उन्नति" न "वेतन वृद्धि"
इसके बावजूद मुझसे पूछा जाता है कि मै दिनभर क्या करती हूँ ?
सभी गृहणी को समर्पित
Millions of millions years have passed and human civilization comes into existence. Existence of God is eternal truth
DIFFERENT CHARACTERS OF WOMAN
I am Raj Kumar Gupta from Delhi India, I always like to share my personal views of life and experiences . I like to meet with new people and visit historical places, religious places.. please send me your comments and suggestions to improve my blogs. Follow my blogs and inspire me.
TRUE EDUCATION
सन्तोष मिश्रा जी के यहाँ पहला लड़का हुआ तो पत्नी ने कहा, "बच्चे को गुरुकुल में शिक्षा दिलवाते है, मैं सोच रही हूँ कि गुरुकुल में शिक्षा देकर उसे धर्म ज्ञाता पंडित योगी बनाऊंगी।"
सन्तोष जी ने पत्नी से कहा, "पाण्डित्य पूर्ण योगी बना कर इसे भूखा मारना है क्या !! मैं इसे बड़ा अफसर बनाऊंगा ताकि दुनिया में एक कामयाबी वाला इंसान बने।।"
संतोष जी सरकारी बैंक में मैनेजर के पद पर थे ! पत्नी धार्मिक थी और इच्छा थी कि बेटा पाण्डित्य पूर्ण योगी बने, लेकिन सन्तोष जी नहीं माने।
दूसरा लड़का हुआ पत्नी ने जिद की, सन्तोष जी इस बार भी ना माने, तीसरा लड़का हुआ पत्नी ने फिर जिद की, लेकिन सन्तोष जी एक ही रट लगाते रहे, "कहां से खाएगा, कैसे गुजारा करेगा, और नही माने।"
चौथा लड़का हुआ, इस बार पत्नी की जिद के आगे सन्तोष जी हार गए , और अंततः उन्होंने गुरुकुल में शिक्षा दीक्षा दिलवाने के लिए वही भेज ही दिया ।
अब धीरे धीरे समय का चक्र घूमा, अब वो दिन आ गया जब बच्चे अपने पैरों पे मजबूती से खड़े हो गए, पहले तीनों लड़कों ने मेहनत करके सरकारी नौकरियां हासिल कर ली, पहला डॉक्टर, दूसरा बैंक मैनेजर, तीसरा एक गोवरमेंट कंपनी मेें जॉब करने लगा।
एक दिन की बात है सन्तोष जी पत्नी से बोले, "अरे भाग्यवान ! देखा, मेरे तीनो होनहार बेटे सरकारी पदों पे हो गए न, अच्छी कमाई भी कर रहे है, तीनो की जिंदगी तो अब सेट हो गयी, कोई चिंता नही रहेगी अब इन तीनो को। लेकिन अफसोस मेरा सबसे छोटा बेटा गुुुरुकुल का आचार्य बन कर घर घर यज्ञ करवा रहा है, प्रवचन कर रहा है ! जितना वह छ: महीने में कमाएगा उतना मेरा एक बेटा एक महीने में कमा लेगा, अरे भाग्यवान ! तुमने अपनी मर्जी करवा कर बड़ी गलती की , तुम्हे भी आज इस पर पश्चाताप होता होगा , मुझे मालूम है, लेकिन तुम बोलती नही हो"।।
पत्नी ने कहा, "हम मे से कोई एक गलत है, और ये आज दूध का दूध पानी का पानी हो जाना चाहिए, चलो अब हम परीक्षा ले लेते है चारों की, कौन गलत है कौन सही पता चल जाएगा ।।"
दूसरे दिन शाम के वक्त पत्नी ने बाल बिखरा , अपनी साड़ी का पल्लू फाड़ कर और चेहरे पर एक दो नाखून के निशान मार कर आंगन मे बैठ गई और पतिदेव को अंदर कमरे मे छिपा दिया ..!!
बड़ा बेटा आया पूछा, "मम्मी क्या हुआ ?"
माँ ने जवाब दिया, "तुम्हारे पापा ने मारा है !"
पहला बेटा :- "बुड्ढा, सठिया गया है क्या ? कहां है ? बुलाओतो जरा।।"
माँ ने कहा, "नही है , बाहर गए है !"
पहला बेटा - "आए तो मुझे बुला लेना , मैं कमरे मे हूँ, मेरा खाना निकाल दो मुझे भूख लगी है !"
ये कहकर कमरे मे चला गया।
दूसरा बेटा आया पूछा तो माँ ने वही जवाब दिया,
दूसरा बेटा : "क्या पगला गए है इस बुढ़ापे मे , उनसे कहना चुपचाप अपनी बची खुची गुजार ले, आए तो मुझे बुला लेना और मैं खाना खाकर आया हूँ सोना है मुझे, अगर आये तो मुझे अभी मत जगाना, सुबह खबर लेता हूँ उनकी ।।",
ये कह कर वो भी अपने कमरे मे चला गया ।
तीसरा बेटा आया पूछा तो आगबबूला हो गया, "इस बुढ़ापे मे अपनी औलादो के हाथ से जूते खाने वाले काम कर रहे है ! इसने तो मर्यादा की सारी हदें पार कर दीं।"
यह कर वह भी अपने कमरे मे चला गया ।।
संतोष जी अंदर बैठे बैठे सारी बाते सुन रहे थे, ऐसा लग रहा था कि जैसे उनके पैरों के नीचे से जमीन खिसक गई हो, और उसके आंसू नही रुक रहे थे, किस तरह इन बच्चो के लिए दिन रात मेहनत करके पाला पोसा, उनको बड़ा आदमी बनाया, जिसकी तमाम गलतियों को मैंने नजरअंदाज करके आगे बढ़ाया ! और ये ऐसा बर्ताव , अब तो बर्दाश्त ही नहीं हो रहा.....
इतने मे चौथा बेटा घर मे ओम् ओम् ओम् करते हुए अंदर आया।।
माँ को इस हाल मे देखा तो भागते हुए आया, पूछा, तो माँ ने अब गंदे गंदे शब्दो मे अपने पति को बुरा भला कहा तो चौथे बेटे ने माँ का हाथ पकड़ कर समझाया कि "माँ आप पिताजी की प्राण हो, वो आपके बिना अधूरे हैं,---अगर पिता जी ने आपको कुछ कह दिया तो क्या हुआ, मैंने पिता जी को आज तक आपसे बत्तमीजी से बात करते हुए नही देखा, वो आपसे हमेशा प्रेम से बाते करते थे, जिन्होंने इतनी सारी खुशिया दी, आज नाराजगी से पेश आए तो क्या हुआ, हो सकता है आज उनको किसी बात को लेकर चिंता रही हो, हो ना हो माँ ! आप से कही गलती जरूर हुई होगी, अरे माँ ! पिता जी आपका कितना ख्याल रखते है, याद है न आपको, छ: साल पहले जब आपका स्वास्थ्य ठीक नही था, तो पिता जी ने कितने दिनों तक आपकी सेवा कीे थी, वही भोजन बनाते थे, घर का सारा काम करते थे, कपड़े धोते थे, तब आपने फोन करके मुझे सूचना दी थी कि मैं संसार की सबसे भाग्यशाली औरत हूँ, तुम्हारे पिता जी मेरा बहुत ख्याल करते हैं।"
इतना सुनते ही बेटे को गले लगाकर फफक फफक कर रोने लगी, सन्तोष जी आँखो मे आंसू लिए सामने खड़े थे।
"अब बताइये क्या कहेंगे आप मेरे फैसले पर", पत्नी ने संतोष जी से पूछा।
सन्तोष जी ने तुरन्त अपने बेटे को गले लगा लिया, !
सन्तोष जी की धर्मपत्नी ने कहा, *"ये शिक्षा इंग्लिश मीडियम स्कूलो मे नही दी जाती। माँ-बाप से कैसे पेश आना है, कैसे उनकी सेवा करनी है। ये तो गुरुकुल ही सिखा सकते हैं जहाँ वेद गीता रामायण जैसे ग्रन्थ पढाये जाते हैैं संस्कार दिये जाते हैं।*
अब सन्तोष जी को एहसास हुआ- जिन बच्चो पर लाखो खर्च करके डिग्रीया दिलाई वे सब जाली निकले , असल में ज्ञानी तो वो सब बच्चे है, जिन्होंने जमीन पर बैठ कर पढ़ा है, मैं कितना बड़ा नासमझ था, फिर दिल से एक आवाज निकलती है, काश मैंने चारो बेटो को गुरुकुल में शिक्षा दीक्षा दी होती ।
I am Raj Kumar Gupta from Delhi India, I always like to share my personal views of life and experiences . I like to meet with new people and visit historical places, religious places.. please send me your comments and suggestions to improve my blogs. Follow my blogs and inspire me.
GOD IS OMNIPRESENT
नानकी जी ने अपने भाई नानक देव जी से पूछा,भाई जी,आप तीन दिन तक कहाँ लोप रहे,गुरू जी ने कहा, "बहन जी मैं निरँकार के सचखण्ड देश में गया था।" वह निरँकार का सच खण्ड देश कैसा है" नानकी जी ने पूछा। इसके बाद गुरू नानक देव जी ने निरँकार के दर की महिमा,जपुजी साहिब में सो दर शब्द द्वारा वर्णन की तथा रहरासि की बाणी में सो दर के शब्द पढ़कर, जिसमें गुरू नानक देव जी ने निरँकार के दर की शोभा को आश्चर्य ढंग से उच्चारण किया है। गुरु नानक देव जी तीन दिन तक सच खँड में निरँकार के पास रहे और जगत् के शीघ्र कल्याण कि लिए यह यह मूलमँत्र लेकर आये थे।
ੴ सति नामु करता पुरखु निरभउ निरवैरु अकाल मूरति अजूनी सैभं गुर प्रसादि ॥
श्री गुरू नानक तथा सिक्ख धर्म का यह मूल मँत्र है और इसी नींव पर सिक्ख धर्म का महल उसारा गया था।
ੴ (एक ओअंकार) : अकाल पुरख केवल एक है, उस जैसा और कोई नहीं तथा वह हर जगह एक रस व्यापक है।
सतिनामु: उसका नाम स्थायी अस्तित्व वाला व सदा के लिए अटल है ।
करता: वह सब कुछ बनाने वाला है।
पुरखु: वह सब कुछ बनाकर उसमें एक रस व्यापक है।
निरभउ: उसे किसी का भी भय नहीं है।
निरवैरु: उसका किसी से भी वैर नहीं है।
अकाल मूरति: वह काल रहित है,उसकी कोई मूर्ति नहीं, वह समय के प्रभाव से मुक्त है।
अजूनी: वह योनियों में नहीं आता,वह न जन्म लेता है व न ही मरता है।
सैभं: उसे किसी ने नहीं बनाया, उसका प्रकाश अपने आप से है।
गुर प्रसादि: ऐसा अकाल पुरख गुरू की कृपा द्वारा मिलता है।
I am Raj Kumar Gupta from Delhi India, I always like to share my personal views of life and experiences . I like to meet with new people and visit historical places, religious places.. please send me your comments and suggestions to improve my blogs. Follow my blogs and inspire me.
FATE IS DECIDED BY GOD
दाने दाने पर लिखा है खाने वाले का नाम । एक दिन गुरू नानक देव जी महाराज अपने दोनो शिष्यो बाला और मरदाना के साथ किसी गाँव में से गुजर रहे थे ।
चलते चलते रास्ते में एक मकई का खेत आया।बाला स्वाभाविक रूप से बहुत कम बोलते थे मगर जो मरदाना थे वे बाल की खाल उधेढ़ कर रख देते थे। अर्थात बात की गहराई तक जाते थे। मकई का खेत देख कर मरदाने ने गुरू नानक देव जी से सवाल किया "बाबा जी इस मकई के खेत में जितने दाने है क्या वे सब पहले से निर्धारित कर दिये गए हैं कि कौन इस का हकदार हैं और यह किस के मुँह में जायेंगे?"
इस पर गुरू नानक देव जी कहा -बिल्कुल इस संसार में कहीं भी कोई भी खाने योग्य वनस्पति पर मोहर पहले से ही लग गई हैं और जिसके नाम की मोहर होगी वही जीव उसका ग्रास करेगा। गुरू नानक देव जी की इस बात ने मरदाने के मन के अन्दर कई सवाल खड़े कर दिए। मरदाने ने मकई के खेत से एक मक्का तोड़ लिया और उसका एक दाना निकाल कर हथेली पर रख लिया और गुरू नानक देव जी से यह पूछने लगा "बाबा जी कृपा करके आप मुझे बताए कि इस दाने पर किसका नाम लिखा है।" इस पर गुरू नानक देव जी ने मुस्करा कर कहा "इस दाने पर एक मुर्गी का नाम लिखा हैं" मरदाने ने उनके सामने बड़ी चालाकी दिखाते हुए मकई का वह दाना अपने मुँह मे डाल लिया और गुरू नानक देव जी से कहने लगा "कुदरत का यह नियम तो बढ़ी आसानी से टूट गया" पर परमात्मा की करनी देखियेगा साधकजनो मरदाने ने जैसे ही वह दाना निगला वह मरदाने की श्वास नली में फंस गया।अब मरदाने की हालत तीर लगे कबूतर जैसी हो गई। मरदाने ने गुरू नानक देव जी को कहा"बाबा जी कुछ कीजिये नहीं तो मैं मर जाऊँगा" गुरू नानक देव जी महाराज ने कहा "बेटा मैं क्या करू कोई वैद्य या हकीम ही इसको निकाल सकता हैं पास के गाँव मे चलते है वहाँ किसी हकीम को दिखाते है । मरदाने को लेकर वे पास के एक गाँव में चले गए। वहाँ एक हकीम मिले उस हकीम ने मरदाने की नाक मे नसवार डाल दी। नसवार बहुत तेज थी नसवार सुंघते ही मरदाने को छींके आनी शुरू हो गई ।छींकने से मकई का वह दाना गले से निकल कर बाहर गिर गया। जैसे ही दाना बाहर गिरा पास ही खड़ी मुर्गी ने झट से वह दाना खा लिया ! यह देखकर मरदाने ने गुरू नानक देव जी से क्षमा माँगी और कहा "बाबा जी मुझे माफ़ कर दीजिए जो मैंने आपकी बात पर शक किया"
गुरू नानक देव जी ने मुस्कराते हुए मरदाने को गले से लगा लिया।
I am Raj Kumar Gupta from Delhi India, I always like to share my personal views of life and experiences . I like to meet with new people and visit historical places, religious places.. please send me your comments and suggestions to improve my blogs. Follow my blogs and inspire me.
GOOD COMPANY SHOW REAL PATH
नियमित सत्संग में आने वाले एक आदमी नें जब एक बार सत्संग में यह सुना कि जिसने जैसे कर्म किये
हैं उसे अपने कर्मोअनुसार वैसे ही फल भी भोगने पड़ेंगे ।यह सुनकर उसे बहुत आश्चर्य हुआ अपनी आशंका का समाधान करने हेतु उसने सतसंग करने वाले संत जी से पूछा "अगर कर्मों का फल भोगना ही पड़ेंगा तो फिर सत्संग में आने का किया फायदा है ? संत जी नें मुसकुरा कर उसे देखा और एक ईंट की तरफ इशारा कर के कहा की तुम इस ईंट को छत पर ले जा कर मेरे सर पर फेंक दो ।यह सुनकर वह आदमी बोला संत जी इससे तो आपको चोट लगेगी दर्द होगा ।मैं यह नहीं कर सकता।संत ने कहा "अच्छा, फिर उसे उसी ईंट के भार के बराबर का रुई का गट्ठा बांध कर दिया और कहा अब
इसे ले जाकर मेरे सिर पर फैंकने से भी क्या मुझे चोट लगेगी? वह बोला नहीं।संत ने कहा बेटा इसी तरह सत्संग में आने से इन्सान को अपने कर्मो का बोझ हल्का लगने लगता है और वह हर दुःख तकलीफ को परमात्मा की दया समझ कर बड़े प्यार से सह लेता है।
सत्संग में आने से इन्सान का मन निर्मल होता है और वह मोह माया के चक्कर में होने वाले पापों से भी बचा रहता है और अपने सतगुरु की मौज में रहता हुआ एक दिन अपने निज घर सतलोक पहुँच जाता है।
जहाँ केवल सुख ही सुख है।
I am Raj Kumar Gupta from Delhi India, I always like to share my personal views of life and experiences . I like to meet with new people and visit historical places, religious places.. please send me your comments and suggestions to improve my blogs. Follow my blogs and inspire me.