Estimate your own power

एक बच्चा जब 13 साल का हुआ तो उसके पिता ने उसे एक पुराना कपड़ा देकर उसकी कीमत पूछी।
बच्चा बोला 100 रु।
तो पिता ने कहा कि इसे बेचकर दो सौ रु लेकर आओ। बच्चे ने उस कपड़े को अच्छे से साफ़ कर धोया और अच्छे से उस कपड़े को फोल्ड लगाकर रख दिया। अगले दिन उसे लेकर वह रेलवे स्टेशन गया, जहां कई घंटों की मेहनत के बाद वह कपड़ा दो सौ रु में बिका।

कुछ दिन बाद उसके पिता ने उसे वैसा ही दूसरा कपड़ा दिया और उसे  500 रु में बेचने को कहा।
इस बार बच्चे ने अपने एक पेंटर दोस्त की मदद से उस कपड़े पर सुन्दर चित्र बना कर रंगवा दिया और एक गुलज़ार बाजार में बेचने के लिए पहुंच गया। एक व्यक्ति ने वह कपड़ा 500 रु में खरीदा और उसे 100 रु ईनाम भी दिया।

जब बच्चा वापस आया तो उसके पिता ने फिर एक कपड़ा हाथ में दे दिया और उसे दो हज़ार रु में बेचने को कहा। इस बार बच्चे को पता था कि इस कपड़े की इतनी ज्यादा कीमत कैसे मिल सकती है । उसके शहर में  मूवी की शूटिंग के लिए एक नामी कलाकार आई थीं। बच्चा उस कलाकार के पास पहुंचा और उसी कपड़े पर उनके ऑटोग्राफ ले लिए।

ऑटोग्राफ लेने के बाद बच्चे ने उसी कपड़े की बोली लगाई। बोली दो हज़ार से शुरू हुई और एक व्यापारी ने वह कपड़ा 12000 रु में ले लिया।

रकम लेकर जब बच्चा घर पहुंचा तो खुशी से पिता की आंखों में आंसू आ गए। उन्होंने बेटे से पूछा कि इतने दिनों से कपड़े बेचते हुए तुमने क्या सीखा ?
बच्चा बोला -  पहले खुद को समझो , खुद को पहचानो । फिर पूरी लगन से मन्ज़िल की और बढ़ो क्योकि जहां चाह होती है, राह अपने आप निकल आती है।'

पिता बोले कि तुम बिलकुल सही हो, मगर मेरा ध्येय तुमको यह समझाना था कि कपड़ा मैला होने पर इसकी कीमत बढ़ाने के लिए उसे धो कर साफ़ करना पड़ा, फिर और ज्यादा कीमत मिली जब उस पर एक पेंटर ने उसे अच्छे से रंग दिया और उससे भी ज्यादा कीमत मिली जब एक नामी कलाकार ने उस पर अपने नाम की मोहर लगा दी ।
तो विचार करें जब इंसान उस निर्जीव कपड़े को अपने हिसाब से उसकी कीमत बड़ा सकता है ।
तो फिर वो मालिक जिसने हम जीवों को बनाया है क्या वो हमारी कीमत कम होने देंगा ?

जीवात्मा भी यहां आकर मैला हो जाता है लेकिन सतगुरु हम मैली जीवात्माओं को पहले साफ़ और स्वच्छ करते हैं, जिससे परमात्मा की नज़र में हम जीवात्माओं की कीमत थोड़ी बढ़ जाती है ।

फिर सतगुरु हम जीवात्माओं को अपनी रहनी के रंग में रंग देते हैं, फिर कीमत और ज्यादा बढ़ जाती है।
और फिर सतगुरु हम पर अपने नाम की मोहर लगा देते हैं फिर तो इंसान अपनी कीमत का अंदाज़ा ही नही लगा सकता।

लेकिन अफ़सोस इतना कीमती इंसान अपने आप को कौड़ियों के दाम खर्च करते जा रहा है उसे अपने आप की ही पहचान नही , उसे अपने ऊपर लगी सतगुरु के नाम रूपी कृपा और उस अपार दया की कद्र नही, क्योकि अगर कद्र होती तो उसके हुकुम में रहकर भजन बन्दगी को पूरा पूरा समय देकर अपने इंसानी जामे का मकसद और उसकी कीमत भी जरूर समझते

गुरु चरणी चित्त ला बन्दया बीती जाए ज़िन्दगानी रे...

Keep patience

स्वर्ग का सेब
एक बार स्वर्ग से घोषणा हुई कि भगवान सेब बॉटने आ रहे है सभी लोग भगवान के प्रसाद के लिए तैयार हो कर लाइन लगाकर खड़े हो गए। एक छोटी बच्ची बहुत उत्सुक थी क्योंकि वह पहली बार भगवान को देखने जा रही थी।एक बड़े और सुंदर सेब के साथ साथ भगवान के दर्शन की कल्पना से ही खुश थी।अंत में प्रतीक्षा समाप्त हुई। बहुत लंबी कतार में जब उसका नम्बर आया तो भगवान ने उसे एक बड़ा और लाल सेब दिया। लेकिन जैसे ही उसने सेब पकड़कर लाइन से बाहर निकली उसका सेब हाथ से छूटकर कीचड़ में गिर गया। बच्ची उदास हो गई।अब उसे दुबारा से लाइन में लगना पड़ेगा। दूसरी लाइन पहली से भी लंबी थी।लेकिन कोई और रास्ता नहीं था। सब लोग ईमानदारी से अपनी बारी बारी से सेब लेकर जा रहे थे।
अन्ततः वह बच्ची फिर से लाइन में लगी और अपनी बारी की प्रतीक्षा करने लगी।आधी क़तार को सेब मिलने के बाद सेब ख़त्म होने लगे। अब तो बच्ची बहुत उदास हो गई। उसने सोचा कि उसकी बारी आने तक तो सब सेब खत्म हो जाएंगे। लेकिन वह ये नहीं जानती थी कि भगवान के भंडार कभी ख़ाली नही होते।जब तक उसकी बारी आई तो और भी नए सेब आ गए ।
भगवान तो अन्तर्यामी होते हैं। बच्ची के मन की बात जान गए।उन्होंने इस बार बच्ची को सेब देकर कहा कि पिछली बार वाला सेब एक तरफ से सड़ चुका था। तुम्हारे लिए सही नहीं था इसलिए मैने ही उसे तुम्हारे हाथों गिरवा दिया था। दूसरी तरफ लंबी कतार में तुम्हें इसलिए लगाया क्योंकि नए सेब अभी पेडों पर थे। उनके आने में समय बाकी था। इसलिए  तुम्हें अधिक प्रतीक्षा करनी पड़ी।
ये सब अधिक लाल, सुंदर और तुम्हारे लिए उपयुक्त है। भगवान की बात सुनकर बच्ची संतुष्ट हो कर गई
इसी प्रकार यदि आपके किसी काम में विलंब हो रहा है तो उसे भगवान की इच्छा मानकर स्वीकार करें। भगवान अपने बच्चों को वही देंगे जो उनके लिए उत्तम होगा। ईमानदारी से अपनी बारी की प्रतीक्षा करने में सबकी भलाई है।  जय गुरू जी

Remember God forever

तीन नौजवान अमेरिका में होटल में ठहरे (75 Floor) मंजिल में कमरा मिला।
रात बारह बजे लिफ्ट बंद हो जाती
एक बार लेट हो गए। सीढ़ियाँ चढ़ते बोरियत दूर करने के लिए एक ने एक लतीफा सुनाया और पच्चीसवीं मंजिल तक आ गए।दूसरे ने गाना सुनाया और अब पचासवीं मंजिल तक आ गए। और तीसरे ने बीमारी सेहत पर किस्सा सुनाया और अब पचत्तरवीं मंजिल पर आ गए। कमरे के दरवाज़े पर पहुँच कर याद आया कमरे की चाबी तो Reception पर भूल आए हैं।
तीनों बे दम होकर गिर पड़े।

सबक
इंसान अपनी ज़िन्दगी के पच्चीस साल खेल कूद हँसीमज़ाक और फज़ूलियत में ज़ाया कर देता है। अगले पच्चीस साल नौकरी काम धंधे शादी बच्चों और उनकी शादी में गुज़ार देता है।
और अब पच्चीस साल अगर ज़िन्दा रहे बीमारी डॉक्टर हॉस्पिटल में चले जाते हैं,
मर गए तब पता चलता है कि परमात्मा  के दर की चाबी तो लाएँ ही नहीं हैं,
वो तो दुनिया में ही रह गईं है।

सुमिरन परमात्मा  के दर की चाबी है। आएँ कुछ अच्छा करें आओ रोज सुमिरन करें

Human conscience

एक शख्स सुबह सवेरे उठा साफ़ कपड़े पहने और राम शरणम की तरफ चल दिया ताकि सतसंग का आनंद मान सके, रास्ते में ठोकर खाकर गिर पड़ा कपड़े कीचड़ से सन गए वापस घर आया कपड़े बदलकर वापस आश्रम की तरफ रवाना हुआ फिर ठीक उसी जगह ठोकर खा कर गिर पड़ा और वापस घर आकर कपड़े बदले फिर आश्रम की तरफ रवाना हो गया जब तीसरी बार उस जगह पर पहुंचा तो क्या देखता है की एक शख्स चिराग हाथ में लिए खड़ा है और उसे अपने पीछे पीछे चलने को कह रहा है इस तरह वो शख्स उसे आश्रम के दरवाज़े तक ले आया पहले वाले शख्स ने उससे कहा आप भी अंदर आकर सतसंग सुन ले लेकिन वो शख्स चिराग हाथ में थामे खड़ा रहा और आश्रम में दाखिल नही हुआ दो तीन बार इनकार करने पर उसने पूछा आप अंदर क्यों नही आ रहे है ? दुसरे वाले शख्स ने जवाब दिया "इसलिए क्योंकि मैं काल हूँ, ये सुनकर पहले वाले शख्स की हैरत का ठिकाना न रहा। शैतान ने अपनी बात जारी रखते हुए कहा मैं ही था जिसने आपको ज़मीन पर गिराया था जब आपने घर जाकर कपड़े बदले और दुबारा आश्रम की तरफ रवाना हुए तो प्रभू ने आपके सारे गुनाह बख्श दिए जब मैंने आपको दूसरी बार गिराया और आपने घर जाकर फिर कपड़े बदले और फिर दुबारा जाने लगे तो प्रभू ने आपके पूरे परिवार के गुनाह बख्श दिए । मैं डर गया की अगर अबकी बार मैंने आपको गिराया और आप फिर कपड़े बदलकर  चले गए तो कहीं ऐसा न हो वह आपके सारे गांव के लोगो के गुनाह  बख्श दे इसलिए मैं यहाँ तक आपको खुद पहुंचाने आया हूँ
अब हम देखे कि उस शख्स ने दो बार गिरने के बाद भी हिम्मत नहीं हारी और तीसरी बार फिर  पहुँच गया और एक हम जीव हैं यदि हमारे घर पर कोई मेहमान आ जाए या हमें कोई काम आ जाए तो उसके लिए हम सत्संग छोड़ देते हैं, भजन जाप छोड़ देते हैं। क्यों??? क्योंकि हम जीव अपने सतगुरु से ज्यादा दुनियावी चीजों और रिश्तेदारों से ज्यादा प्यार करते हैं। उनसे ज्यादा मोह हैं। इसके विपरीत वह शख्स दो बार कीचड़ में गिरने के बाद भी तीसरी बार फिर घर जाकर कपड़े बदलकर आश्रम चला गया। क्यों?क्योंकि उसे अपने दिल में सतगुरू के लिए बहुत प्यार था। वह किसी कीमत पर भी अपनी बंदगीं का नियम टूटने नहीं देना चाहता था इसीलिए उस शैतान ने स्वयं उस शख्स को मंजिल तक पहुँचाया, जिसने कि उसे दो बार कीचड़ में गिराया और मालिक की बंदगी में रूकावट डाल रहा था, बाधा पहुँचा रहा था
इसी तरह हम जीव भी जब हम भजन सिमरन पर बैठे तब हमारा मन चाहे कितनी ही चालाकी करे या कितना ही बाधित करे, हमें हार नहीं माननी चाहिए और मन का डट कर मुकाबला करना चाहिए। एक न एक दिन हमारा मन स्वयं हमें भजन सिमरन के लिए उठायेगा और उसमें रस भी लेगा। बस हमें भी हिम्मत नहीं हारनी चाहिए और न ही किसी काम के लिए भजन सिमरन में ढील देनी हैं। वह मालिक, सतगुरु आप ही हमारे काम सिद्ध और सफल करेगा।
इसीलिए हमें भी मन से हार नहीं माननी चाहिए और निरंतर अभ्यास करते रहना चाहिए

THE GEETA BY LORD KRISHNA

गीता ज्ञान

कर्मयोग

अध्याय 3 : श्लोक-31

ये ते मतमिदं नित्यमनुतिष्ठन्ति मानवाः।
श्रद्धावन्तोऽनसूयन्तो मुच्यन्ते तेऽपि कर्मभिः॥

ये– जो; मे– मेरे; मतम् – आदेशों को; इदम्– इन; नित्यम् – नित्यकार्य के रूप में; अनुतिष्ठन्ति– नियमित रूप से पालन करते हैं; मानवाः – मानव प्राणी; श्रद्धा-वन्तः – श्रद्धा तथा भक्ति समेत; अनसूयन्तः– बिना ईर्ष्या के; मुच्यन्ते – मुक्त हो जाते हैं; ते – वे; अपि– भी; कर्मभिः – सकामकर्मों के नियमरूपी बन्धन से |

भावार्थ:जो व्यक्ति मेरे आदेशों के अनुसार अपना कर्तव्य करते रहते हैं और ईर्ष्यारहित होकर इस उपदेश का श्रद्धापूर्वक पालन करते हैं, वे सकाम कर्मों के बन्धन से मुक्त हो जाते हैं।
तात्पर्य:श्रीभगवान कृष्ण का उपदेश समस्त वैदिक ज्ञान का सार है, अतः किसी अपवाद के बिना यह शाश्वत सत्य है। जिस प्रकार वेद शाश्वत हैं, उसी प्रकार कृष्णभावनामृत का यह सत्य भी शाश्वत है। मनुष्य को चाहिए कि भगवान् से ईर्ष्या किये बिना इस आदेश में दृढ़ विश्वास रखे। ऐसे अनेक दार्शनिक है, जो भगवद्गीता पर टीका रचते हैं, किन्तु कृष्ण में कोई श्रद्धा नहीं रखते। वे कभी भी सकाम कर्मों के बन्धन से मुक्त नहीं हो सकते। किन्तु एक सामान्य पुरुष भगवान के इन आदेशों में दृढविश्वास करके कर्म-नियम के बन्धन से मुक्त हो जाता है, भले ही वह इन आदेशों का ठीक से पालन न कर पाए, किन्तु चूँकि मनुष्य इस नियम से रुष्ट नहीं होता और पराजय तथा निराशा का विचार किये बिना निष्ठापूर्वक कार्य करता है, अतः वह विशुद्ध कृष्णभावनामृत को प्राप्त होता है।

गीता ज्ञान