कृष्ण जी का सच्चा भक्त

भाव के भूखे है मेरे कान्हा..!! 
बहुत सुंदर, बड़े भाव से पढ़े:
कृष्ण भगवान का एक बहुत बड़ा भक्त हुआ लेकिन वो बेहद गरीब था।
एक दिन उसने अपने शहर के सब से बड़े "गोविन्द गोधाम" की महिमा सुनी और उसका वहाँ जाने को मन उत्सुक हो गया।
कुछ दिन बाद जन्माष्टमी आने वाली थी उसने सोचा मै प्रभु के साथ जन्माष्टमी "गोविन्द गोधाम" में मनाऊँगा।
गोंविंद गोधाम उसके घर से बहुत दूर था। जन्माष्टमी वाले दिन वो सुबह ही घर से चल पड़ा।
उसके मन में कृष्ण भगवान को देखने का उत्साह और मन में भगवान के भजन गाता जा रहा था।
रास्ते में जगह जगह लंगर और पानी की सेवा हो रही थी, वो यह देखकर बहुत आनंदित हुआ की वाह प्रभु आपकी लीला ! मैने तो सिर्फ सुना ही था कि आप गरीबो पर बड़ी दया करते हो आज अपनी आँखों से देख भी लिया।
सब गरीब और भिखारी और आम लोग एक ही जगह से लंगर प्रशाद पाकर कितने खुश है।
भक्त ऑटो में बैठा ही देख रहा था उसने सबके देने पर भी कुछ नही लिया और सोचा पहले प्रभु के दर्शन करूँगा फिर कुछ खाऊँगा ! क्योंकि आज तो वहाँ ग़रीबो के लिये बहुत प्रशाद का इंतेज़ाम किया होगा।
रास्ते में उसने भगवान के लिए थोड़े से अमरुद का प्रशाद लिया और बड़े आनंद में था भगवान के दर्शन को लेकर।
भक्त इतनी कड़ी धूप में भगवान के घर पहुँच गया और मंदिर की इतनी प्यारी सजावट देखकर भावविभोर हो गया।
भक्त ने फिर मंदिर के अंदर जाने का किसी से रास्ता पूछा।किसी ने उसे रास्ता बता दिया और कहा यह जो लाईने लगी हुई है आप भी उस लाइन में लग जाओ।
वो भक्त भी लाईन में लग गया वहाँ बहुत ही भीड़ थी पर एक और लाइन उसके साथ ही थी पर वो एकदम खाली थी।
भक्त को बड़ी हैरानी हुई की यहाँ इतनी भीड़ और यहाँ तो बारी ही नही आ रही और वो लाइन से लोग जल्दी जल्दी दर्शन करने जा रहे है।
उस भक्त से रहा न गया उसने अपने साथ वाले भक्त से पूछा की भैया यहाँ इतनी भीड़ और वो लाइन इतनी खाली क्यों है और वहाँ सब जल्दी जल्दी दर्शन के लिए कैसे जा रहे है वो तो हमारे से काफी बाद में आए है।
उस दूसरे भक्त ने कहा भाई यह VIP लाइन है जिसमे शहर के अमीर लोग है।
भक्त की सुनते ही आँखे खुली रह गई उसने मन में सोचा भगवान के दर पे क्या अमीर क्या गरीब यहाँ तो सब समान होते है।
कितनी देर भूखे प्यासे रहकर उस भक्त की बारी दरबार में आ ही गई और भगवान को वो दूर से देख रहा था और उनकी छवि को देखकर बहुत आनंदित हो रहा था।
वो देख रहा था की भगवान को तो सब लोग यहाँ छप्पन भोग चढ़ा रहे है और वो अपने थोड़े से अमरुद सब से छुपा रहा था।
जब दर्शन की बारी आई तो सेवादारो ने उसे ठीक से दर्शन भी नही करने दिए और जल्दी चलो जल्दी चलो कहने लगे। उसकी आँखे भर आई और उसने चुपके से अपने वो अमरुद वहाँ रख दिए और दरबार से बाहर चला गया।
दरबार के बाहर ही लंगर प्रशाद लिखा हुआ था। भक्त को बहुत भूख लगी थी सोचा अब प्रशाद ग्रहण कर लू ।
जेसे ही वो लंगर हाल के गेट पर पहुँचा तो 2 दरबान खड़े थे वहाँ उन्होंने उस भक्त को रोका और कहा पहले VIP पास दिखाओ फिर अंदर जा सकोगे।
भक्त ने कहाँ यह VIP पास क्या होता है मेरे पास तो नही है। उस दरबान ने कहा की यहाँ जो अमीर लोग दान करते है उनको पास मिलता है और लंगर सिर्फ वो ही यहाँ खा सकते हैं।
भक्त की आँखों में इतने आँसू आ गए और वो फूट फूट कर रोने लगा और भगवान से नाराज़ हो गया और अपने घर वापिस जाने लगा।
रास्ते में वो भगवान से मन में बातें करता रहा और उसने कहा प्रभु आप भी अमीरों की तरफ हो गए आप भी बदल गए प्रभु मुझे आप से तो यह आशा न थी और सोचते सोचते सारे रास्ते रोता रहा।
भक्त घर पर पहुँच कर रोता रोता सो गया।
भक्त को भगवान् ने नींद में दर्शन दिए और भक्त से कहा तुम नाराज़ मत होओ मेरे प्यारे भक्त
भगवान ने कहा अमीर लोग तो सिर्फ मेरी मूर्ति के दर्शन करते है।अपने साक्षात् दर्शन तो मै तुम जैसे भक्तों को देता हूँ ...
और मुझे छप्पन भोग से कुछ भी लेंना देंना नही है मै तो भक्त के भाव खाता हूँ और उनके आँसू पी लेता हूँ और यह देख मै तेरे भाव से चढ़ाए हुए अमरुद खा रहा हूँ।
भक्त का सारा संदेह दूर हुआ और वो भगवान के साक्षात् दर्शन पाकर गदगद हो गया और उसका गोविंद गोधाम जाना सफल हुआ और भगवान को खुद उसके घर चल कर आना पड़ा।
भगवान भाव के भूखे है बिन भाव के उनके आगे चढ़ाए छप्पन भोग भी फीके है !!!

Surrender to god

एक एक शब्द पर ध्यान चाहिए-
आपका मन एक राजमहल है, यह मन भगवान की सम्पत्ति है, आपकी नहीं है, आपको तो सार संभाल के लिए मिली है। वे भगवान इसके स्वामी हैं, आप तो मात्र इसके चौकीदार हो।
आपको चाहिए कि इसे साफ सुथरा रखते हुए, इसके वास्तविक स्वामी की प्रतीक्षा करें, कि जब वो आएंगे तो आपकी सेवा देख कर, प्रसन्न हो कर, आपको अपनी भक्ति उपहार स्वरूप देंगे।
पर आपने इसे न केवल अपना मान लिया है, बल्कि इसे अपना मान कर, इसे सराय बना डाला है। आपने इसमें संसार भर के चोर बसा कर, इसे वासनाओं की गंदगी से भर दिया है।
इसे देव मंदिर बना कर,  इससे भगवान की सेवा करके, इसमें भक्ति की सुगंध भरते, तो भक्ति आपका जीवन सुख और शांति से भर देती, तब तो बात ही कुछ और होती। पर आपने इसे देह मंदिर बना डाला, इसे संसार की सेवा में लगा कर, इसमें आसक्ति की दुर्गंध भर दी। अब आसक्ति तो दुख और अशांति की माँ है, वह आपके जीवन को तकलीफ़ों से ही तो भरेगी।
और ऐसा नहीं है कि वे भगवान जानते नहीं कि उनके मन महल में क्या प्रपंच रचा जा रहा है, वे तो सब जानते हैं। वे कहीं दूर हों ऐसा भी नहीं है। वे इस मन महल में आना न चाहते हों, ऐसा भी नहीं है। वे तो यहीं हैं। बाहर बाहर घूमते हैं। बार बार झाँक कर देखते हैं कि कब यह मन उनके प्रवेश करने लायक हो और वे भीतर प्रवेश कर सकें। पर हर बार वे इस मन में संसार भर की भीड़ ही पाते हैं और हर बार उनके हाथ मायूसी ही लगती है।
देखो वे भगवान बड़े दयालु हैं, उनकी दया का सागर अभी चुक नहीं गया है। अपने आत्मिक मित्र लोकेशानन्द की बात मान लो। अभी भी समय है। मौत की चिट्ठी भले आ गई हो, अभी वह स्वयं नहीं आई है। इससे पहले कि इस मन के स्वामी भगवान का दण्डाधिकारी यम, अपने भैंसे पर चढ़ आए, और आपको मृत्युपाश में जकड़ कर घसीटता ले जाए, इस मन दरबार को खाली कर, साफ सुथरा कर लो। मेरे अयोध्यानाथ भगवान श्रीसीतारामजी कृपालु हैं, वे आपके अपराध नहीं गिनेंगे, तुरंत क्षमादान दे देंगे।
वरना याद रखना लाश के पैरों में जूतियाँ नहीं होतीं, कफन में जेब नहीं होती, मौत के दफ्तर में कभी छुट्टियां नहीं होतीं॥

कृष्ण जन्माष्टमी की झांकियां

कृष्ण जन्माष्टमी एक बहुत ही बड़ा भारतीय त्योहार है इसमें श्री कृष्ण जी के जन्मदिन पर सभी भारतीय लोग अपने मंदिरों और घरों में श्री कृष्ण जी की सेवा चुनाव करते हैं और उपवास रखते हैं रात के 12:00 बजे तक श्री कृष्ण जी का जन्म होता है उस समय लोग हर्षोल्लास से इस उत्सव को बड़े उत्साह और उमंग से मनाते हैं भारतीय श्री कृष्ण जी को एक शाश्वत और अपने जीवन का अभिन्न अंग मानते हैं और वे रोज श्री कृष्ण जी के बाल रूप की पूजा करते हैं पूजा अर्चना में सभी प्रकार के भोग लगाए जाते हैं वृंदावन और मथुरा में विशेषकर जन्माष्टमी के दिन बेहद ही सुंदर दृश्य को देखने को मिलता है यह सभी मंदिरों को बड़े सुंदर ढंग से सजाया जाता है और विभिन्न प्रकार के व्यंजनों का भोग  लगाया जाता है

True Sikhism

एक गरीब, एक दिन एक सिक्ख के पास, अपनी जमीन बेचने गया। बोला सरदार जी मेरी 2 एकड़ जमीन आप रख लो।सिक्ख बोला, क्या कीमत है?गरीब बोला,50 हजार रुपये।सिक्ख, थोड़ी देर सोच के, वो ही खेत जिसमे ट्यूबवेल लगा है।
गरीब -जी। आप,मुझे 50 हजार से कुछ कम भी देंगे, तो जमीन, आपको दे दूँगा। सिक्ख ने आंखे बंद की 5 मिनट सोच के.. नही, मैं उसकी कीमत 2 लाख रुपये दूँगा।गरीब..पर मैं 50 हजार ले रहा हूँ आप 2 लाख क्यो ?सिक्ख बोला, तुम जमीन क्यों बेच रहे हो?
गरीब बोला, बेटी की शादी करना है। बच्चों की पढ़ाई की फीस जमा करना है। बहुत कर्ज है। मजबूरी है। इसीलिए मज़बूरी में बेचना है। पर आप 2 लाख क्यों दे रहे हैं?
सिक्ख बोला, मुझे जमीन खरीदना है। किसी की मजबूरी नही खरीदना, अगर आपकी जमीन की कीमत मुझें मालूम है। तो मुझें, आपके कर्ज,आपकीं जवाबदेही और मजबूरी का फायदा नही उठाना. मेरा "वाहेगुरू" कभी खुश नहीं होगा।
ऐसी जमीन या कोई भी साधन,जो किसी की मजबूरियों को देख के खरीदे। वो घर और जिंदगी में,सुख नही देते, आने वाली पीढ़ी मिट जाती है।
हे,मेरे मित्र,तुम खुशी खुशी, अपनी बेटी की शादी की तैयारी करो। 50 हजार की हम पूरा गांव व्यवस्था कर लेगें। तेरी जमीन भी तेरी रहेगी। मेरे, गुरु नानकदेव साहिब ने भी,अपनी बानी में, यही हुक्म दिया है।
गरीब हाथ जोड़कर, आखों में नीर भरी खुशी-खुशी दुआयें देता चला गया।
ऐसा जीवन, हम भी बना सकते है।
बस किसी की मजबूरी, न खरीदे। किसी के दर्द, मजबूरी को समझकर, सहयोग करना ही सच्चा तीर्थ है। ... एक यज्ञ है। ...सच्चा कर्म और बन्दगी है।...
हम सबके सच्चे संत भी यही कहते हैं।

RESPECT PARENTS

"अरे! भाई बुढापे का कोई ईलाज नहीं होता अस्सी पार चुके हैं।अब बस सेवा कीजिये "डाक्टर पिता जी को देखते हुए बोला।"डाक्टर साहब ! कोई तो तरीका होगा । साइंस ने बहुत तरक्की कर ली है "
"शंकर बाबू ! मैं अपनी तरफ से दुआ ही कर सकता हूँ . बस आप इन्हें खुश रखिये ।इस से बेहतर और कोई दवा नहीं है और इन्हें लिक्विड पिलाते रहिये जो इन्हें पसंद है ." डाक्टर अपना बैग सम्हालते हुए मुस्कुराया और बाहर निकल गया .
शंकर पिता को लेकर बहुत चिंतित था। उसे लगता ही नहीं था कि पिता के बिना भी कोई जीवन हो सकता है . माँ के जाने के बाद अब एकमात्र आशीर्वाद उन्ही का बचा था ।उसे अपने बचपन और जवानी के सारे दिन याद आ रहे थे ।कैसे पिता हर रोज कुछ न कुछ लेकर ही घर घुसते थे। बाहर हलकी-हलकी बारिश हो रही थी ।ऐसा लगता था जैसे आसमान भी रो रहा हो। शंकर ने खुद को किसी तरह समेटा और पत्नी से बोला
"सुशीला ! आज सबके लिए मूंग दाल के पकौड़े,हरी चटनी बनाओ।मैं बाहर से जलेबी लेकर आता हूँ ."
पत्नी ने दाल पहले ही भिगो रखी थी । वह भी अपने काम में लग गई ।कुछ ही देर में रसोई से खुशबू आने लगी पकौड़ों की ।शंकर भी जलेबियाँ ले आया था। वह जलेबी रसोई में रख पिता के पास बैठ गया । उनका हाथ अपने हाथ में लिया और उन्हें निहारते हुए बोला -
"बाबा ! आज आपकी पसंद की चीज लाया हूँ ।थोड़ी जलेबी खायेंगे ?"पिता ने आँखे झपकाईं और हल्का सा मुस्कुरा दिए ।वह अस्फुट आवाज में बोले -
"पकौड़े बन रहे हैं क्या ?" "हाँ, बाबा ! आपकी पसंद की हर चीज अब मेरी भी पसंद है ।अरे! सुषमा जरा पकौड़े और जलेबी तो लाओ।" शंकर ने आवाज लगाईं।
"लीजिये बाबू जी एक और" उसने पकौड़ा हाथ में देते हुए कहा। "बस...अब पूरा हो गया। पेट भर गया, जरा सी जलेबी दे" पिता बोले।शंकर ने जलेबी का एक टुकड़ा हाथ में लेकर मुँह में डाल दिया। पिता उसे प्यार से देखते रहे।"शंकर ! सदा खुश रहो बेटा. मेरा दाना पानी अब पूरा हुआ", पिता बोले।"बाबा ! आपको तो सेंचुरी लगानी है। आप मेरे तेंदुलकर हो," आँखों में आंसू बहने लगे थे।वह मुस्कुराए और बोले- "तेरी माँ पेवेलियन में इंतज़ार कर रही है, अगला मैच खेलना है। तेरा पोता बनकर आऊंगा, तब खूब  खाऊंगा बेटा।"
पिता उसे देखते रहे। शंकर ने प्लेट उठाकर एक तरफ रख दी . मगर पिता उसे लगातार देखे जा रहे थे। आँख भी नहीं झपक रही थी। शंकर समझ गया कि यात्रा पूर्ण हुई।तभी उसे ख्याल आया, पिता कहा करते थे
"श्राद्ध खाने नहीं आऊंगा कौआ बनकर, जो खिलाना है अभी खिला दे।"माँ बाप का सम्मान करें और उन्हें जीते जी खुश रखें।