सतत जीवन चाहिए तो सरल बनो

यदि व्यक्ति को अपना जीवन सतत यानी कि निरंतर प्रगतिशील और उन्नति मान बनाना है तो उसे सरल बने रहना पड़ेगा जैसे गांव का साधारण किसान जिस मस्ती और जिस भावना से अपना जीवन बिता पर है उसके मन में कोई विस्तरण आया लालसा नहीं होती जिसके कारण वह अपने जीवन को निश्चल और शांत भाव से बिताता है जबकि भौतिक वस्तुओं से गिरा इंसान अपने आप को इच्छाओं के जाल में इस प्रकार समेट लेता है कि उसकी जीवन सरल ना रहकर विकट और दुष्कर् जाता है अपने आप को सरल बनाए रखने के लिए ठीक हूं सरल भाव का होना भी जरूरी है यदि उसकी भावना सरल और सुगम है तो उसकी सोच और उसकी मानसिक अवस्था भी संतोष वाली रहेगी और उसको किसी चीज का नुकसान या फायदा नहीं होगा क्योंकि वह उन परिस्थितियों में भी अपने आप को सरल बनए रखता है जिस प्रकार की शान फसल बोने के बाद अपनी उम्मीद है भगवान के ऊपर छोड़ देता है जिसके कारण हो सरल रहता है और उसको देव इच्छा के द्वारा वही प्राप्त होते हैं जो उसके निष्काम फल का प्रतीक होता हैयदि आप इस लेख से सहमत हैं या असहमत हैं तो कृपया अपने कमेंट जरूर करें ताकि आने वाले लेखों में उसका ध्यान रखा जा सके

जो मांगो अपने गुरु से मांगो









यदि आपका मन अपने गुरु के अंदर समाया हुआ है तो आप जो भी गुरु से मांगेंगे वह आपको मिलेगा सबसे बड़ा सुख गुरु के होने का यही है कि आपका मन शांत और सुखी रहता है आपका मन विचलित नहीं होता  आप किसी काम को करने से बिल्कुल नहीं डरते हैं क्योंकि आपको पता है कि आपका गुरु उस कार्य को संभालने में समर्थ है और विकट से विकट परिस्थिति में आपके साथ है तो आप उस कार्य को करने में निष्फल नहीं होते है।गुरु से मांगी कोई भी याचना कभी खाली नहीं जाती गुरु आपको आपकी सामर्थ्य से भी अधिक दे देता है क्योंकि गुरु आपकी अंतर्मन की चेतना को समझ लेता है और उन को साकार रूप देने में जो भी परिस्थितियां बनती है उनको बनाता चला जाता है जिसके जाल में हम अपने आप ही बने रहते हैं और उसमें पूरी तरह से मग्न हो जाते हैं यदि हम गुरु को ही मांग ले तो शायद हमारे को भौतिक चीजों की आवश्यकता है यही नहीं होगी क्योंकि जो मन को चाहिए वह नैतिक शिक्षा चाहिए ना कि भौतिक शिक्षा जो पूरे समाज के विघटन का कारण होती है क्योंकि मानव की इच्छाएं अनंत यार उसका कोई अंत नहीं है उनको पूरा करने के लिए इसके द्वारा किए गए कार्य कभी भी सीधे और सरल नहीं रह पाती परंतु गुरु की शरण में जाने पर सभी कार्य बेहद ही सरल और साधारण तरीके से पुरे होते हैं इसका इंसान कभी गुमान भी नहीं कर सकता

हमारा अंतर्मन सबसे बड़ी अदालत है

जब भी हम किसी क्रियाकलाप को करते हैं तो हमारे किए गए क्रियाकलाप में सच या झूठ जरूर शामिल होता है यदि हम किसी गलत कार्य में संलग्न है तो हमारे अंतर्मन को पता होता है कि हम यह गलत कर रहे हैं परंतु हमारा दिल दिमाग अंतर मन की आवाज को नहीं सुनता है और हमारे दिमाग दिल और पूरी भावनाओं पर हावी होता रहता है जिसके कारण हम अंतर मन की आवाज को दबाते रहते हैं जो कि इंसान की पतन का कारण बनता है
इसीलिए कहा गया है कि अंतर्मन ही भगवान की सबसे बड़ी अदालत होता है जो हमारे को सही और गलत का निर्णय देने में सक्षम है परंतु इंसान अपनी इस अंतर्मन भावना को व्यक्त करने से डरता है या उसको मानने से इनकार करता है जिसके कारण की समस्या विकट रूप धारण कर लेती है चाहे समाज में उसका रुतबा कितना भी बड़ा क्यों ना हो जाए परंतु उसका अंतर्मन यह जानता है कि मैं गलत कार्यों की वजह से ही ऊपर उठाया है जो कि बिना झूठ बोले संभव ही नहीं था अपनी उन्नति तरक्की और दूसरों से आगे निकलने की भावना ही उसको अंतर्मन की आवाज दबाने की शक्ति प्रदान करती है यदि व्यक्ति अपने अंतर्मन से डरे तो शायद उसका ज्यादा अच्छा प्रभाव पड़े लेकिन व्यक्ति अंतर्मन से डरना छोड़ देता है जिसके कारण यह सारी विकृतियां बड़ा रूप धारण कर लेती है हर इंसान अपने आप को गलतियों का पुतला बनाता चला जाता है और उसमें सुधार की कोई गुंजाइश ही नहीं छोड़ता है

incarnation of Lord Krishna

श्री कृष्ण लीला सम्पूर्ण क्रमश
हे केशव -- अंधकार को दूर करने और ज्ञान प्राप्त करने का कोई सुगम साधन बताओ।
श्रद्धा - ज्ञान प्राप्त करने के लिए ,केवल साधन है श्रद्धा।
 श्रद्धा के बीज से ही विश्वास का अंकुर फूटता है और आस्था का पौधा लहराने लगता है फिर इसी पौधे पर ज्ञान के फूल खिलते हैं।
श्रद्धा बिनु विनय और विनम्रता न आए पार्थ, श्रद्धा विहीन प्राणी अहम् लिए चलता।
श्रद्धा के गर्भ से ही लेता विश्वास जन्म, विश्वास से ही हृदय तर्क जाल से निकलता।।
श्रद्धा से निष्ठा और निष्ठा से एक निष्ठ, एक निष्ठ हुए बिना काम नहीं चलता।
श्रद्धा बिनु प्रेम नही भक्ति नहीं,  प्रेम बिनु श्रद्धा ही दिलाए ईश  प्राप्ति में सफलता। ।
हे माधव--  कहते हैं,  मनुष्य अंतिम सांस तक माया मोह में पड़ा रहता है परंतु तुम्हीं ने इस माया मय सृष्टि की रचना करके और दूसरी ओर मनुष्य को चंचल मन प्रदान करके दोनों को एक दूसरे में उलझा दिया है।
क्षमा करना--  तुमने जाल बिछाकर शिकारी की भाति जाल में फंसे मनुष्य के हाथ पैर  बांधे छठ पटाने का तमाशा देखते रहते हो।
नहीं अर्जुन--  मैं तमाशा नहीं देखता मैं अपनी माया की लीला देखता हूं।
फिर भी निहारते रहते हो सहायता नहीं करते कि बेचारा प्राणी इधर उधर भटक रहा है, रास्ता भूल पड़ा है, आपके मन में मनुष्य की सहायता करने का विचार कभी नहीं आता। आकर उसका हाथ थाम लो। मैं देख रहा हूं तुमने जो कर्म का विधान बना दिया है और इस जन्म मरण का चक्कर बना दिया है, इस चक्रव्यूह में उसे फंसा दिया है , यह तो कोई बात नहीं हुई। कोई सहायता नहीं हुई।
पार्थ--  में सहायता अवश्य करता हूं अपने भक्तों को मैं कभी भी बेसहारा नहीं छोड़ता, परंतु मनुष्य मेरी ओर देखें, सहायता के लिए मेरी ओर बढ़े, तो मैं सहायता करूं न
परंतु मेरी ओर बढ़ने के बजाय अपने अहंकार में डूबा रहता है, अपने बाहुबल के घमंड में पड़ा रहता है कि संसार में उस से बढ़कर कोई नहीं। वह  केवल अपने बुद्धि और बल पर ही भरोसा करता है,  अपने बाहुबल पर उसे अपने परमात्मा से भी अधिक विश्वास होता है।
रास्ते में भटके हुए मनुष्य की सहायता के लिए आखिर तुम उससे क्या चाहते हो ? क्या तुम्हे सोने चांदी के चढ़ावे चाहिए।
 मैं मनुष्य से एक श्रद्धा के अतिरिक्त कुछ भी नहीं चाहता। हे अर्जुन--  इतना भी ना हो सके तो श्रद्धा या भक्ति का एक आंसू ही सही मैं उसे भी कबूल कर लेता हूं , श्रद्धा में डूबे हुए आंसू से मैं प्रसन्न हो जाता हूं।
जब तक है इन पर अहम का पर्दा, तब तक मैं देता ना दिखाई।
जिसके मन से मैं नहीं निकली, उसने मेरी कृपा नहीं पाई।
 मुझे समर्पण के भाव प्यारे, उसे मिलूं जो मन से पुकारे।
 हे नाथ नारायण वासुदेवा, हे नाथ नारायण वासुदेवा।।
अर्थात भक्ति का स्थान इतना ऊंचा है।
हां अर्जुन--  एक केवल एक शर्त है, पूर्ण श्रद्धा और पूर्ण भक्ति से अपने आपको अपने सारे कर्मों को मेरे प्रति समर्पित कर दें बस।
वाह प्रभु वाह
क्रमश  हे प्रभु आपकी जय हो जय हो  कृपा करो प्रभु कृपा करो।

ईश्वर स्तुति, सर्वश्रेष्ठ जीवन का आधार

महामूर्ख कौन ?

"ज्ञानचंद नामक एक जिज्ञासु भक्त था।

वह सदैव प्रभुभक्ति में लीन रहता था।

रोज सुबह उठकर पूजा- पाठ, ध्यान-भजन करने का उसका नियम था।

उसके बाद वह दुकान में काम करने जाता।

दोपहर के भोजन के समय वह दुकान बंद कर देता और फिर दुकान नहीं खोलता था।
बाकी के समय में वह साधु-संतों को भोजन करवाता, गरीबों की सेवा करता, साधु-संग एवं दान-पुण्य करता।

व्यापार में जो भी मिलता उसी में संतोष रखकर प्रभुप्रीति के लिए जीवन बिताता था।

उसके ऐसे व्यवहार से लोगों को आश्चर्य होता और लोग उसे पागल समझते।

लोग कहतेः
'यह तो महामूर्ख है।
कमाये हुए सभी पैसों को दान में लुटा देता है।
फिर दुकान भी थोड़ी देर के लिए ही खोलता है।

सुबह का कमाई करने का समय भी पूजा-पाठ में गँवा देता है।
यह तो पागल ही है।'

एक बार गाँव के नगर सेठ ने उसे अपने पास बुलाया।

उसने एक लाल टोपी बनायी थी।

नगर सेठ ने वह टोपी ज्ञानचंद को देते हुए कहाः
'यह टोपी मूर्खों के लिए है।
तेरे जैसा महान् मूर्ख मैंने अभी तक नहीं देखा,इसलिए यह टोपी तुझे पहनने के लिए देता हूँ।

इसके बाद यदि कोई तेरे से भी ज्यादा बड़ा मूर्ख दिखे तो तू उसे पहनने के लिए दे देना।'

ज्ञानचंद शांति से वह टोपी लेकर घर वापस आ गया।

एक दिन वह नगर सेठ खूब बीमार पड़ा।

ज्ञानचंद उससे मिलने
गया और उसकी तबीयत के हालचाल पूछे।

नगरसेठ ने कहाः
'भाई ! अब तो जाने की तैयारी कर रहा हूँ।'

ज्ञानचंद ने पूछाः
'कहाँ जाने की तैयारी कर रहे हो?
वहाँ आपसे पहले किसी व्यक्ति को सब तैयारी करने के लिए भेजा कि नहीं?
आपके साथ आपकी स्त्री, पुत्र, धन, गाड़ी, बंगला वगैरह आयेगा किनहीं?'

'भाई ! वहाँ कौन साथ आयेगा?
कोई भी साथ नहीं आने वाला है।
अकेले ही जाना है।

कुटुंब-परिवार, धन- दौलत, महल-गाड़ियाँ सब छोड़कर यहाँ से जाना है।

आत्मा-परमात्मा के सिवाय किसी का साथ नहीं रहने वाला है।'

सेठ के इन शब्दों को सुनकर ज्ञानचंद ने खुद को दी गयी वह लाल टोपी नगर सेठ को वापस देते हुए कहाः
'आप ही इसे पहनो।'

नगर सेठः'क्यों?'

ज्ञानचंदः 'मुझसे ज्यादा मूर्ख तो आप हैं। जब आपको पता था कि पूरी संपत्ति, मकान, परिवार वगैरह सब यहीं रह जायेगा, आपका कोई भी साथी आपके साथ नहीं आयेगा, भगवान के सिवाय कोई भी सच्चा सहारा नहीं है, फिर भी आपने पूरी जिंदगी इन्हीं सबके पीछे क्यों बरबाद कर दी?

सुख में आन बहुत मिल बैठत रहत चौदिस घेरे।

विपत पड़े सभी संग छोड़तकोउ न आवे नेरे।।

जब कोई धनवान एवं शक्तिवान होता है तब सभी 'सेठ... सेठ.... साहब... साहब...' करते रहते हैं और अपने स्वार्थ के लिए आपके आसपास घूमते रहते हैं।

परंतु जब कोई मुसीबत आती है तब कोई भी मदद के लिए पास नहीं आता।

ऐसा जानने के बाद भी आपने क्षणभंगुर वस्तुओं एवं संबंधों के साथप्रीति की, भगवान से दूर रहे एवं अपने भविष्य का सामान इकट्ठा न किया तो ऐसी अवस्था में आपसे महान् मूर्ख दूसरा कौन हो सकता है?

गुरु तेग बहादुर जी ने कहा हैः
करणो हुतो सु ना कीओ परिओ लोभ के फंध।
नानक समिओ रमि गइओ अब किउ रोवत अंध।।

सेठजी ! अब तो आप कुछ भी नहीं कर सकते।
आप भी देख रहे हो कि कोई भी आपकी सहायता करने वाला नहीं है।'

क्या वे लोग महामूर्ख नहीं हैं जो जानते हुए भी मोह-माया में फँसकर ईश्वर सेविमुख रहते हैं?

संसार की चीजों में, संबंधों का संग एवं दान-पुण्य करते हुए जिंदगी व्यतीत करते तो इस प्रकार दुःखी होने एवं पछताने का समय न आता।" ...!!!