Millions of millions years have passed and human civilization comes into existence. Existence of God is eternal truth
सतत जीवन चाहिए तो सरल बनो
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जो मांगो अपने गुरु से मांगो
यदि आपका मन अपने गुरु के अंदर समाया हुआ है तो आप जो भी गुरु से मांगेंगे वह आपको मिलेगा सबसे बड़ा सुख गुरु के होने का यही है कि आपका मन शांत और सुखी रहता है आपका मन विचलित नहीं होता आप किसी काम को करने से बिल्कुल नहीं डरते हैं क्योंकि आपको पता है कि आपका गुरु उस कार्य को संभालने में समर्थ है और विकट से विकट परिस्थिति में आपके साथ है तो आप उस कार्य को करने में निष्फल नहीं होते है।गुरु से मांगी कोई भी याचना कभी खाली नहीं जाती गुरु आपको आपकी सामर्थ्य से भी अधिक दे देता है क्योंकि गुरु आपकी अंतर्मन की चेतना को समझ लेता है और उन को साकार रूप देने में जो भी परिस्थितियां बनती है उनको बनाता चला जाता है जिसके जाल में हम अपने आप ही बने रहते हैं और उसमें पूरी तरह से मग्न हो जाते हैं यदि हम गुरु को ही मांग ले तो शायद हमारे को भौतिक चीजों की आवश्यकता है यही नहीं होगी क्योंकि जो मन को चाहिए वह नैतिक शिक्षा चाहिए ना कि भौतिक शिक्षा जो पूरे समाज के विघटन का कारण होती है क्योंकि मानव की इच्छाएं अनंत यार उसका कोई अंत नहीं है उनको पूरा करने के लिए इसके द्वारा किए गए कार्य कभी भी सीधे और सरल नहीं रह पाती परंतु गुरु की शरण में जाने पर सभी कार्य बेहद ही सरल और साधारण तरीके से पुरे होते हैं इसका इंसान कभी गुमान भी नहीं कर सकता
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हमारा अंतर्मन सबसे बड़ी अदालत है
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incarnation of Lord Krishna
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ईश्वर स्तुति, सर्वश्रेष्ठ जीवन का आधार
"ज्ञानचंद नामक एक जिज्ञासु भक्त था।
वह सदैव प्रभुभक्ति में लीन रहता था।
रोज सुबह उठकर पूजा- पाठ, ध्यान-भजन करने का उसका नियम था।
उसके बाद वह दुकान में काम करने जाता।
दोपहर के भोजन के समय वह दुकान बंद कर देता और फिर दुकान नहीं खोलता था।
बाकी के समय में वह साधु-संतों को भोजन करवाता, गरीबों की सेवा करता, साधु-संग एवं दान-पुण्य करता।
व्यापार में जो भी मिलता उसी में संतोष रखकर प्रभुप्रीति के लिए जीवन बिताता था।
उसके ऐसे व्यवहार से लोगों को आश्चर्य होता और लोग उसे पागल समझते।
लोग कहतेः
'यह तो महामूर्ख है।
कमाये हुए सभी पैसों को दान में लुटा देता है।
फिर दुकान भी थोड़ी देर के लिए ही खोलता है।
सुबह का कमाई करने का समय भी पूजा-पाठ में गँवा देता है।
यह तो पागल ही है।'
एक बार गाँव के नगर सेठ ने उसे अपने पास बुलाया।
उसने एक लाल टोपी बनायी थी।
नगर सेठ ने वह टोपी ज्ञानचंद को देते हुए कहाः
'यह टोपी मूर्खों के लिए है।
तेरे जैसा महान् मूर्ख मैंने अभी तक नहीं देखा,इसलिए यह टोपी तुझे पहनने के लिए देता हूँ।
इसके बाद यदि कोई तेरे से भी ज्यादा बड़ा मूर्ख दिखे तो तू उसे पहनने के लिए दे देना।'
ज्ञानचंद शांति से वह टोपी लेकर घर वापस आ गया।
एक दिन वह नगर सेठ खूब बीमार पड़ा।
ज्ञानचंद उससे मिलने
गया और उसकी तबीयत के हालचाल पूछे।
नगरसेठ ने कहाः
'भाई ! अब तो जाने की तैयारी कर रहा हूँ।'
ज्ञानचंद ने पूछाः
'कहाँ जाने की तैयारी कर रहे हो?
वहाँ आपसे पहले किसी व्यक्ति को सब तैयारी करने के लिए भेजा कि नहीं?
आपके साथ आपकी स्त्री, पुत्र, धन, गाड़ी, बंगला वगैरह आयेगा किनहीं?'
'भाई ! वहाँ कौन साथ आयेगा?
कोई भी साथ नहीं आने वाला है।
अकेले ही जाना है।
कुटुंब-परिवार, धन- दौलत, महल-गाड़ियाँ सब छोड़कर यहाँ से जाना है।
आत्मा-परमात्मा के सिवाय किसी का साथ नहीं रहने वाला है।'
सेठ के इन शब्दों को सुनकर ज्ञानचंद ने खुद को दी गयी वह लाल टोपी नगर सेठ को वापस देते हुए कहाः
'आप ही इसे पहनो।'
नगर सेठः'क्यों?'
ज्ञानचंदः 'मुझसे ज्यादा मूर्ख तो आप हैं। जब आपको पता था कि पूरी संपत्ति, मकान, परिवार वगैरह सब यहीं रह जायेगा, आपका कोई भी साथी आपके साथ नहीं आयेगा, भगवान के सिवाय कोई भी सच्चा सहारा नहीं है, फिर भी आपने पूरी जिंदगी इन्हीं सबके पीछे क्यों बरबाद कर दी?
सुख में आन बहुत मिल बैठत रहत चौदिस घेरे।
विपत पड़े सभी संग छोड़तकोउ न आवे नेरे।।
जब कोई धनवान एवं शक्तिवान होता है तब सभी 'सेठ... सेठ.... साहब... साहब...' करते रहते हैं और अपने स्वार्थ के लिए आपके आसपास घूमते रहते हैं।
परंतु जब कोई मुसीबत आती है तब कोई भी मदद के लिए पास नहीं आता।
ऐसा जानने के बाद भी आपने क्षणभंगुर वस्तुओं एवं संबंधों के साथप्रीति की, भगवान से दूर रहे एवं अपने भविष्य का सामान इकट्ठा न किया तो ऐसी अवस्था में आपसे महान् मूर्ख दूसरा कौन हो सकता है?
गुरु तेग बहादुर जी ने कहा हैः
करणो हुतो सु ना कीओ परिओ लोभ के फंध।
नानक समिओ रमि गइओ अब किउ रोवत अंध।।
सेठजी ! अब तो आप कुछ भी नहीं कर सकते।
आप भी देख रहे हो कि कोई भी आपकी सहायता करने वाला नहीं है।'
क्या वे लोग महामूर्ख नहीं हैं जो जानते हुए भी मोह-माया में फँसकर ईश्वर सेविमुख रहते हैं?
संसार की चीजों में, संबंधों का संग एवं दान-पुण्य करते हुए जिंदगी व्यतीत करते तो इस प्रकार दुःखी होने एवं पछताने का समय न आता।" ...!!!
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